बुधवार, 31 मार्च 2010

कब लगेगा अंकुश

रैली देश के चिंतन का घोतक है या व्यक्तित्व महत्वकांक्षा की प्रकाष्ठा। सम्बोधन के और भी सार्थक तरीके हो सकते है या रैली ही अकेला विकल्प। वैसे तो राजनीति में मर्यादा का कोई स्थान नहीं होता किन्तु आम जनता को बार-बार अलग-अलग उदहारणों से मर्यादाओं में बंधे रहने को बाध्य किया जाता है। क्या राजनीति मर्यादाओं के बाहर है? अगर है तो कैसे एक समाज का चिंतन कर जीवन की टीस को मिटाने में सक्षम है? ज्वलंत प्रश्न है।। अभाव, गरीबी, बेबसी के समाधान क्या रैलियों में ही निहीत है? या ये केवल समाज को भटकाकर अपनी लालसाओं की पूर्ति का मंच है। बुद्धिजीवी वर्ग जो संवेदना एंव सहयोग की नींव पर जीता है, का और भी उपहास इस तरह के तमाशों से होता है।आज शायद राजनीति भी अपनी किस्मत को कोसती होगी जब इस तरह के तमाशों का हिस्सा बनती है। जबरन किए गए लोगों के समक्ष महामहिमा पूर्ण आण्डमबर का प्रदर्शन क्या शाबित करता है? वैसे तो यह एक तरफा समवाद है, थोपना है। लेकिन बाद में बची धूल का गुबार अनायास ही शेष बचे निशानों से पूछता तो होगा कि कब लगेगा अंकुश? अंकुश अर्थविहीन तमाशे पर। अंकुश व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पर। क्योंकि इस प्रक्रिया में राजनीति भी अपना अस्तित्व एवं लक्ष्य खोती जा रही है। लक्ष्य जो सार्थक प्रयासों को प्रेरित करता है, जो हितों का रक्षक होने की भूमिका निभाता है, विक्षि’ व अपाहिज होकर लाचार है।देश का एक बड़ा वर्ग अभाव में जूझ रहा है और इस अभाव को आधर बना कर सपनों के महल दिखाए जा रहे है, लेकिन वक्त की गति में जिन्दगी पिछड़ जाती है। जाने कब लगेगा अंकुश? आओ मिलकर बहिष्कार कर इन तमाशों का। ताकि इस मातृभूमि पर जन्में सभी नागरिक एक बार तो अभाव मुक्त जिन्दगी को देख ले। और अपनी क्षमताओं के योगदान से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध धरोहर का सजृन कर सके। तमाशों का बहिष्कार, अंकुश की ओर एक नई पहल। जय हो माया, इस चिंगारी को जगाने के लिए।क्या देश की सामाएँ इस तरह की मालाओं से सुरक्षित रह सकती है? क्या ऐसे तमाशे गरीब जनता की भूख मिटा पाएंगें या फिर त्याग और बलिदान की परम्परा भूला दी जानी चाहिए? देश की अस्मिता व अखण्डता को ताक पर रख देना चाहिए या फिर राष्ट चरित्र के निर्माण की परिभाषा बदलनी होगी? अंकुश लगे इन महत्वकांक्षाओं पर। क्या ये तमाशे स्वतंत्रता व संविधान की गरिमा पर एक कलंक है? अगर है तो अंकुश लगे।विसमृत तमाशविनों की बजाए आओ एक जागृत नागरिक की भूमिका निभाएं।