मंगलवार, 20 मई 2014

N D A ka D N A



प्राकृतिक  आपदाओं  और निर्मित की  गयी आपदाओं  में हानि बराबर की  होती है !  २०१४  के चुनाव परिणाम से से शायद कांग्रेस के प्रतिभावान नेता और शीर्ष नेतृतव समझ पाये के अकाल कैसा होता है !
आमजन की अपेक्षाओं को नकारने की कीमत कई बरसों में चुकता होगी !

हालाँकि देश की कुल जनसँख्या के केवल १४ % समर्थन समर्थन  मात्र से ही भा ज पा  को २०१४ के चुनाव में विस्मयकारी जीत प्राप्त हुई है ! कई चैनलों से मिली खंबरों से लगता  है के आत्ममुगध  भावी प्रधानमंत्री  अब संयुक्त मोर्चे  संयोजक पद  भी  स्वयं के नियंत्रण मैं रखना चाहते है ! काया कोई  और   योग्य व्यक्ति पार्टी मैं नहीं जो ईस कर्तवय को निभा सके ?

या ये स्वयं केंद्रित सत्ता की लालसा का ही प्रतीक है ! कियूंकि जिसको विगत मैं अन्य राजनितिक दलों के व्यक्ति विशेष  के बारे मैं बड़े जोर शोर से  उजागर और प्रचारित किया गया था और इस मानदंड को नकारत्मक  बता कर  देश को नयी परिभाषा गढ़ने को परेरित किया गया था !

लोकतान्त्रिक दाल मैं व्यक्ति केंद्रित  सत्ता को स्थापित करने के सिद्धांत इतना ठोस हो चला है यह इस महवकांक्षा से स्पष्ट विदित है !

तथकथित  ज्ञान के ठेकेदार  अत्ति उत्साहित हो आर इसको भी तर्कसंगत बनाने मैं जुट गए हैं !

मंगलवार, 13 मई 2014

मिथक जब सैद्धांतिक रूप धारण करने लगते है  तब सविकारोकति के साहस  क्षीण  हो जात्ते हैं !

तब  भाव  व् तृप्ति के बीच की खाई अपना आकर ले  लेती है!

पर्ारम्भ मैं  बौद्धिकता इसे आभाव  मानती  परन्तु समय के साथ साथ यह निरन्तर विचलितता की प्रकिर्या को बढ़ा देत्ती है !
जीवन की सहजता बिखरने  लगती है!

अंतरंग उद्वेग ज्वालमुखी के रूप में कुंठाओं को उबलने लगते हैं ! संतुलन  असहज होकर डोलने लगता है तब मन क्षुब्ध्ता की ग्रिफ्त से निकल  पाता ! 
अनन्ता  मिथक हावी हो कर उद्वेग का दमन करते है   और फिरकभी न खत्म  होती टीस रगों  मैं बहने लगती है ! यह अवस्था जीवन को  अंधकार मैं धकेलने  जहां निश्ब्ध पशाताप अधूरी प्यास  को कुरेदने लगता है! और मन मेघों को तलाश मैं शुष्क होने लगता है ! 

जाने अनजाने  में ही समझौतों की परिणीति उजागर हो जीवन को भ्रम मैं डाल देती है और मिथक कभी शुद्ध तृष्णा को तृप्त  होने   नहीं देते ! तब अस्तित्व का हर अंग सवाल बन कर चुभने  लगता है ! मन तन  जीवन विपरीत दिशाओं मैं बढ़ाने लगता है ,हताशा मैं जीवन उप्पेर की और तकता है ! नीले शून्य में खुद को ढूंढने की चेष्टा  करता है ! निराशा भी अपने पाश मैं जकड  कर  लौटने को विवश कर देती है ! 

अन्तत आभाव ही शेष बचता है और उपलब्ध होता है! मिथक पूर्णता को  पराजित कर फिर स्थापित हो जात्ता है!
इस विड़म्बना को सहज कोमल  मन समझ नहीं पाता और क्षति के दर से पुरंता के अनुभव से भटक जात्ता है औचक ही नियंत्रित अनशन को सार्थक मानाने लगता है ! और ये चूक तृष्णा की तृप्ति के मार्ग अवरुद्ध कर देती है ! तब तुलनाओं में सुखद अनुभूति की तलाश तीव्र हो कर भंवर की और खींचती है  सपर्श व् तृप्ति की परिभाषाओं को वासनाओ की पूर्ति का आवरण पहना कर जीवन की सहजता को मिथक दूषिता के मार्ग पैर धकेल देता है , और जीवन  बोध  अनुभितियां केवल खोखली ही रह जत्ती है !