गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

कोमन वेल्थ लाइव

जाग मछंदर गोरख आया ।
ये मुक्ति के लिए की गयी पुकार थी । और विलासिता के गर्भ से मुक्ति हुई भी । पुरानी बात है , अब युग बदल गया है , २१ वी सदी है । मूल्य बढ़ रहे है या उनके साथ-साथ लालसाएं , और उनको पूरा करने व करवाने में सहयोगियों की एक पूरी जमात ६५ की उम्र में भी बाल दाढ़ी काली कर अपनी करनी पर अभिभूत है । गर्व है की हमने वो सब काम किये जिन्हें स्कूल में नहीं करने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन शिक्षक तो वेतन पाता है उसका काम है पढाना। हम समझे या उसका आचरण करे ये हमारी मर्जी । स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार है हमे ।

सतयुग में राम नाम की उपलब्धि ही धर्म का चरम था २१ वी सदी में माया । काली तो बिलकुल भी नहीं ।
लूट सके तो लूट । गरीब की रोटिय भी पूरी तरह सिक नहीं पाती और उनकी , हमे क्या ? रोटियों के लिए कौन प्रयासरत है ? शतरंज की खेल का शौक है प्यादों को इस्तेमाल करना ही हमारी फितरत है छल और कपट का आनंद ही हमारी भूख है । भावना , मर्म , संवेदना का इस खेल में रत्ती भर भी गुन्जायिश नहीं । जिंदगी एक बार मिलती है जी भरकर सदुपयोग कर लें और अपने समकालीन के प्रेरणास्रोत बनकर आने वाली नई पीढ़ियों को संस्कार विहीन बाँझ कर दें। सामजिक सरोकार और मानवता के पाठ का समय नहीं है खेल का समय है ।

और फिर प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हमे भी तो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी है , देश का गौरव बढ़ाना है । भ्रष्टाचार केवल संवैधानिक शब्द नहीं है कार्यशैली है हमारी । नैतिकता हमारी छल कपट और ठगी है । वेदों , उपनिषदों, ग्रंथों, और गुरुवों की वाणी का हम आदर तो करते हैं लेकिन प्रासंगिता के कसौटी पर हमारे अपने ही सिद्धांत है ।
षड्यंत्रों में महारत हासिल करना ही हमारी उत्कृष्टता है भले ही नैतिकता कितनी भी आहत हो । इसलिए हम सजा नहीं इनाम के हकदार है । प्रथा भी है अच्छे प्रदर्शन का इनाम मिलना । प्रदर्शन भले ही चाटुकारिता , चापलूसी,या गुमराह करने का हो। आतंरिक सच्चाई को धरातल पर लाने के प्रयासों को ठेंगा दिखाना ही हमारी कुशलता है ।

यही गिद्ध का सूप है । हम खाने की परम्परा का पूर्ण निष्ठा से निर्वाह कर रहे है । नोंच-नोंच कर खाने के स्वाद को आप नहीं जानते । हमारी दार्शनिकता की यही परिभाषा बनती है ।

इसलिए न अब सुदामा की हिम्मत बची है किसी द्वार पर जाने की और शायद हरिश्चंद की सत्यवादिता का हठ दुबारा इस देश में जन्म भी न लेना चाहेगा । खेल , खिलाडी,सफलता, गौरव,सम्मान , भ्रष्टाचार या अपमान।

जाने कहाँ लाइव है कोमन वेल्थ ?

रविवार, 29 अगस्त 2010

मन्हगाई डायन मारे जात है

देश भी है , संविधान भी है , स्वन्तन्त्रता भी है , चुनाव भी है , मुद्दे भी है , और जनता जनार्दन भी -फिर पीडा क्यों ?

"मेरे देश की धरती गोला उगले , उगले दंगा फसाद "

कोयले की दलाली नही फिर भी सत्ता के मतवालों के चेहरे काले काले से क्यो है ? कुछ के तो और भी वीभत्स ।
शायद मानवता , दया, धर्म के सिद्धान्तो की आहुति देने के बाद यही रूप निखरता है ।

लेकिन अन्त्योदय का साक्षी यह नही समझाता । उद्धार की आस मे उसके बाल पीले ।
लेकिन कहाँ है सामाधान?
हमने देखा, हम देख रहे है , हम देखेगे की सम्मान जनक दो जून की रोटी कैसे?
मन्हगाई की जवानी थांठे मार रही है ।
कल्पनाये करने मे कहाँ पैसा लगता है । राम राज्य । अन्त्योदय का उद्धार। योजनाये है। नही होगी । तो मुद्दे नही । मुद्दे कभी मरा नही करते इस लिए फिर अगला चुनाव । फिर अपना चुनने का अवसर ।

प्रजातन्त्र मे अभी भी पूर्ण निष्ठा लगभग सारे देश की है लेकिन धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा के अँधेपन से ग्रसित मतदान को आवश्यक कानून बनाने की वकालत करने वाले कहाँ आमजन की पीडा को पहचान पायेगे।
पीडा ठगे जाने की । पीडा बेटी को व्याहने की । पीडा सम्मान जनक कमाने की। पीडा सिर छुपाने की । पीडा प्यास बुझाने की।
कही है रास्ता ? नही चुपके से गरीबी मुस्कुराई । कैसे समाधान मूर्खता पर बेरोजगारी का अट्ठाहस । जी इस पीडा के साथ । जगह जगह अस्पताल है गोली खा इलाज कर। समाधान के मानसून पर्यावरण के गरत मे गए।
मामला समाधान का नही भूँख का है बड़ो की भूँख भी बडी । समझ ले । और किस्म किस्म की है। परम्परा भी है की बडे की भूँख पहले । छोटा तो अपना है । त्याग करना उसका कर्तव्य है समझा लेगे। देख लेगे अगली बार। झन्डा देख कर जी लेगा।


अरे भूँखे पेट समाधान नही होत लाला। और सरकार का समाधान से कोइ सरोकार नही कडवा सच है जान ले स्वीकार ले ।
माँ की अस्मिता पर घात लगाने वालो का ही समाधान नही । उसकी सिस्कियाँ भी सुनाई नही देती । अब खुद सोच कुर्सी से बेवफाई का कलंक कौन अपने माथे पर लेना चाहेगा।
इसलिए अभाव का चर्खा
कात । तसल्ली कर । दोष मढने की मानसिकता से उबर । अनुशासन मे रह । झन्डा देख वोट डाल , केवल वोट।

"मिले सुर मेरा तुम्हारा इंडिया शाइनिंग करे हमारा "


विकास जारी है इसलिए घबरा मत वोट डाल - जयहिंद ।

मंगलवार, 11 मई 2010

फतवे का पंचतन्त्र

बहिष्कार ओर मौत,
दो ही तोहफे है फतवे के।
सजा और जुर्माना शोषण का एक ये भी नायाब तरीका है।
कुंठाओं के फन की छाया को भी अगर तार्किक चुनौती देने की हिम्मत की तो ईनाम फतवा।फतवे की परम्परा समाज में विकृत, शुद्र मानसिकता का एक गंभीर उदाहरण है। जहाँ समाधान की खोज समय की मांग है वहाँ कुंठित वर्ग के स्वयंभूओं के लिए फतवा एक ब्रह्माश्त्र है। जहाँ न्यायपूर्ण निर्णय समाज की सार्थक दिशा तय कर सकते है वहीं फतवा समाज को दहात में रख कर अपनी सत्ता को स्थापित करने का एक घृणित प्रयास है।
चौपाल की गरीमा पर एक बदनुमा दाग है फतवा। संस्कृति व मूल्यों की संरक्षक चौपाल को कटघरे में खड़ा करने की कुचेष्टाओं के पीछे के पहलूओं को समझना भी जरूरी हो जाता है।जागीर, बस यहाँ तक याद है, लेकिन जागीर की जिम्मेवारियों के तप से दूर का भी नाता नहीं। केवल व्यक्तिगत भूख मिटाने के लिए है फतवा। मांस का लोथड़ा नौचने को इक्ट्ठे, ताजे मांस पर जीब लपलपाती हैं, मांस नहीं मिला तो फतवा जारी। रात के अंधेरे में गिदड़े ने क्या कुछ नहीं किया। नियमों को क्या ताक पर नहीं धरा? फिर उजाले में भी उसकी मानसिक विकृति बहुत बार उजागर हुई है। कुछ नियम तो प्रासंगिक है, कुछ फतवे के लिए। मापदण्ड़ सभी के लिए बराबर हो इसका फतवे से कोई सम्बन्ध नहीं है। नियम टूटे नहीं, कुछ बदले, की फतवा जारी। और गिदड़ को तो मौका चाहिए। कैसे फिर उसका छत्रप बने, कैसे उसके महिमा मण्डल की आभा फिर लौटे, लोग उसकी वाह-वाही करे। चौपाल के सांझे हुक्के में बड़ा दम होता है, उसके कश लगाते ही ज्ञान में बड़ी वृद्घि होती है, सोच कर वह भी हुक्के की शरण में। करिश्मा हुआ, हुक्के ने राह दिखाई फतवा जारी। समाज को तोड़ने का अपराध? शादियों से समाज बनता है या टूटता है? इस सवाल को जवाब किसे के पास नहीं। लेकिन शादियाँ तो होती हैं, होनी भी है, कुछ नियमों के साथ तो कुछ बदलते परिवेश में। नियम टूटे नहीं कुछ बदले जरूर हैं और गीदड़ की ताक पूरी, समाज को तोड़ने का अपराध, की फतवे का समय आया।
लेकिन बेरोजगारी से हताश नई पीढी एक तरफ भू्रण हत्या का दंश झेल रही है और दूसरी तरफ फतवे का फन फूंकार रहा है। मान लिया जाए की समाज टकराव के दौराहे पर आन खड़ा हुआ है। सवाल टकराव का नहीं कुछ और है क्या समाधान चुक गये है? टूटती परम्पराओं को संस्कारों के लिए कौन जिम्मेदार है, कच्चे घड़े या उनको बनाने वाले। कहीं तो कोई चुक है। दोष किसी का भी हो, खामियाजा आज की पीढी को भी भुगतना पड़ता है। फतवे के जिन से नए होसले सहम से गए हैं। डर से भटकाव और भी बढता लग रहा है, समाज की बुनियाद को कौन सा घुन खोखला कर रहा है? नीचे से ऊपर की ओर, बहाव हो नहीं सकता, तो फिर ये क्या है?समाज का निमार्ण मानव समूह में परस्पर निर्भरता पर आधारित रहता है। सहयोग ही एकमात्र बन्धन है, लेकिन बिखराव आज के प्रयाय बन गए है। कैसे कहाँ किस का अभिशाप टूटते बन्धन का कारण है, सवार्थ या प्रतिस्पर्धा या तप और परिश्रम का शॉर्ट कट। प्यालों से गिरते आत्मबल या लालच की चौखट पर धाराशाई आत्म सम्मान। विश्लेषण जरूरी है लेकिन यथार्थ को स्वीकारने की हिम्मत ही कहाँ बची है इसलिए थोपने या कब्जा करने की परम्पराओं का बोल-बाला है और अपनी कमी को छुपाने के लिए फतवा जारी। दौहरे मापदण्ड है कभी जात के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी समाज के नाम पर मानवता का हनन जारी है। गिदड़ के अस्तित्व की लड़ाई है, लेकिन किससे?नई दिशा तय करना, नई पीढी का काम तो नहीं। तो क्या टैक्नोलोजिकल चैन्ज को स्वीकार कर लेना क्या आखरी विकल्प बचा है?

रविवार, 18 अप्रैल 2010

घड़ियाल की चौसर

आस्था का व्याकरण भी बड़ा विचित्र है। तर्क की इसमें कोई जगह नहीं, कोई भी मात्रा कहीं भी लग जाती हैं। अलग-अलग ढंग से व्याख्याएँ हैं। मंडी है और इस मंडी में घड़ियाल बड़े मजे से आम चूसते है । मूल से बिछड़े हुए सुख के धरातल को खोजते हैं। सहर्ष बहते भी है, बिना किसी ठोस पतवार के। व्यवहारिकता दूर किनारों पर रह जाती है। भरोसे के वस्त्र, पेड़ की शाखाओं के मित्र हो जाते हैं। भ्रम और यथार्थ के भंवर में असहाय जीवन छटपटाता है। यहाँ विण्डमनाएँ अठखेलियाँ करती है और आस का तिनका भी हाथों से फिसल जाता है, तब घड़ियाल की एन्ट्री होती है। इसका संग भाने लगता है, डर में कुछ भी अच्छा लगता है। गहराई का डर, पर कभी तली तक पाँव जमाने का साहस नहीं हो पाता, धारा ही इतनी तेज है, बहाव है, गति है।

करिश्मे का खेल भी होता है। क्योंकि कहीं ना कहीं विश्वास की सुक्ष्म भूमिका बनी रहती है आस-पास। लेकिन कितना शुद्घ, कितना सच्चा, कितना मूल। बाहरी या भीतरी, भाव या विचार, संस्कार या व्यवहार, स्थूल या सुक्ष्म, दया या धूर्तता। कहाँ फुरसत है ये सब जानने की, समक्षने की, स्वीकारने की। होड़ है मुक्त होने की, छुटकारा पाने की। आदमी अपने आप से छुपने लगता है, खुद को ठगने लगता है। यह दशा घड़ियाल अच्छे से समक्षता है, इसीलिए तो उसके दावे हैं पार लगाने के, मुक्ति देने के। अब उसका बाजार बड़ा लुभावना लगता है। जाने-अन्जाने में ही वक्त बदलने व किस्मत फिरने के सपने में समय चुक जाता है। ऋण अगली पीढियाँ चुकाती हैं। और घड़ियाल मजे से आम चुस्ता है। कलयुग है कह कर, अपनी इमानदारी का आश्वाशन दे पल्ला छाड़ लेते है। लाचार सा जीवन गुंगा हो जाता है, पाप की दलदल में से घड़ियाल बड़ी शान से बहार आता है, फिर वहीं आम चुस्ता है।

जिन्दगी के नाटक का सुत्रधार चार कन्धों पे हिचकोले खाता अपना सफर पुरा करता है। शेष रह जाती है, कुछ दर्द की राख और कर्ज की हड्डियाँ। मायूसी होसलों को घेर लेती है, नई रोशनी की दस्तक भी आँगन तक नहीं पहुँच पाती। फिर कोई टूटा हुआ दीप, एक नई आस दिखाता है और जिंदगी का पहिया अपनी धूरी पर धीरे-धीरे घूमने लगता है। लेकिन घड़ियाल फिर वहीं का वहीँ है। नई फसल के नए आम चुस्ता हैं।

बुधवार, 31 मार्च 2010

कब लगेगा अंकुश

रैली देश के चिंतन का घोतक है या व्यक्तित्व महत्वकांक्षा की प्रकाष्ठा। सम्बोधन के और भी सार्थक तरीके हो सकते है या रैली ही अकेला विकल्प। वैसे तो राजनीति में मर्यादा का कोई स्थान नहीं होता किन्तु आम जनता को बार-बार अलग-अलग उदहारणों से मर्यादाओं में बंधे रहने को बाध्य किया जाता है। क्या राजनीति मर्यादाओं के बाहर है? अगर है तो कैसे एक समाज का चिंतन कर जीवन की टीस को मिटाने में सक्षम है? ज्वलंत प्रश्न है।। अभाव, गरीबी, बेबसी के समाधान क्या रैलियों में ही निहीत है? या ये केवल समाज को भटकाकर अपनी लालसाओं की पूर्ति का मंच है। बुद्धिजीवी वर्ग जो संवेदना एंव सहयोग की नींव पर जीता है, का और भी उपहास इस तरह के तमाशों से होता है।आज शायद राजनीति भी अपनी किस्मत को कोसती होगी जब इस तरह के तमाशों का हिस्सा बनती है। जबरन किए गए लोगों के समक्ष महामहिमा पूर्ण आण्डमबर का प्रदर्शन क्या शाबित करता है? वैसे तो यह एक तरफा समवाद है, थोपना है। लेकिन बाद में बची धूल का गुबार अनायास ही शेष बचे निशानों से पूछता तो होगा कि कब लगेगा अंकुश? अंकुश अर्थविहीन तमाशे पर। अंकुश व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पर। क्योंकि इस प्रक्रिया में राजनीति भी अपना अस्तित्व एवं लक्ष्य खोती जा रही है। लक्ष्य जो सार्थक प्रयासों को प्रेरित करता है, जो हितों का रक्षक होने की भूमिका निभाता है, विक्षि’ व अपाहिज होकर लाचार है।देश का एक बड़ा वर्ग अभाव में जूझ रहा है और इस अभाव को आधर बना कर सपनों के महल दिखाए जा रहे है, लेकिन वक्त की गति में जिन्दगी पिछड़ जाती है। जाने कब लगेगा अंकुश? आओ मिलकर बहिष्कार कर इन तमाशों का। ताकि इस मातृभूमि पर जन्में सभी नागरिक एक बार तो अभाव मुक्त जिन्दगी को देख ले। और अपनी क्षमताओं के योगदान से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध धरोहर का सजृन कर सके। तमाशों का बहिष्कार, अंकुश की ओर एक नई पहल। जय हो माया, इस चिंगारी को जगाने के लिए।क्या देश की सामाएँ इस तरह की मालाओं से सुरक्षित रह सकती है? क्या ऐसे तमाशे गरीब जनता की भूख मिटा पाएंगें या फिर त्याग और बलिदान की परम्परा भूला दी जानी चाहिए? देश की अस्मिता व अखण्डता को ताक पर रख देना चाहिए या फिर राष्ट चरित्र के निर्माण की परिभाषा बदलनी होगी? अंकुश लगे इन महत्वकांक्षाओं पर। क्या ये तमाशे स्वतंत्रता व संविधान की गरिमा पर एक कलंक है? अगर है तो अंकुश लगे।विसमृत तमाशविनों की बजाए आओ एक जागृत नागरिक की भूमिका निभाएं।