शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

बलिदांन और पाखंड के दोराहे पे खड़ा लोकतंत्र

 ये  ज़रनैली  सड़क  है साहेब , 

तारीखी  अज्म  से मुलविस , 


इसके इकबाल और जलाल  की  मीनारें  गवाह  हैं  शहँशाहों  हुकमरानो के नापाक मंसूबों की !


ये  आवांम  की  शहादतों  मे  मगनून आज भी ज़िन्दा  है ! 


भारत मे अलग अलग दौर मे बहुत  से  संघर्षों  की  दास्ताने  समेटे  हुये  है ,यहीं से गुजरे हैं  सत्ताओं के  परिवर्तनो  के  काफिले ! 


तक्षषिला  और  पाटल्लीपुत्र  को जोड़ती भी है ! 


सचखण्ड के सरोवर की पवित्रता और आकालतख्त के शब्दों  के  होंसलों को मोक्ष के  घाटों  से  मिलाती  भी है ! 


आवांम  की  त्वक्को  के  मनफी  माजाक  की  कीमतें भी  दर्ज हैं इसके  मोडों  मे !  


किनारों पे खडे  खामोश  पेडों  से  ही  एक  बार  मशविरा कर  लिया  जाये , हकीकतों  के  जाने  कितने फलसफे  खुल जायेंगे ! 

 

ये  ज़रनैली  सड़क  हमेशा  आवांम के साथ ही  रही है , सत्ताओँ  को  मात  देते  हुये !


मौसमों  के  अफसाने  इसके  हर संग ओ मील पे  दर्ज हैं !


इसकी पनाह  मे  मीलों  तक खेत खलिहान  बसे हुये हैं ! अनाज  इसी  जरनैली  सड़क  से  अपने  मुकाम  तक  पहूँचता  है !


मेहनत की  ईबारत  है  ये  तिजारत  की  रहगुजर नहीं  ये  ज़रनैली  सड़क  ! 

साहेब , इसके बांकपन ने  परचम  लहराये हैं  और इसके  गर्द ओ गुबार  ने  अहंकार  मिटाये  हैं ! 


तारीख गवाह  है  !

षडय़न्त्रों  की  जैसे  जैसे परतें खुलेंगी  , 

वैसे वैसे परींणाम भी तय होने  लगेंगे  !