बुधवार, 25 जून 2014

भारत  के   राजनैतिक इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है के जन  कल्याण के कुछेक सफल प्रसंगों को छोड़ कर बाकि   ज्यादातर नीतियों , नेताओं , योजनाओं  की असफलताओं का ही वर्णन  है!
देश के निर्माण , विकास, मजबूती, और सुरक्षा के पहलुओं  पर  गर्व करने लायक कुछ भी नहीं है !
या यूँ कहे के अधिकाँशतय  नेताओं  की महत्वकांक्षाओं के दुष्परिणामों  से देश गर्सित रहा है !

देश के अस्तित्व को सुदृढ़ के लिए राजनैतिक इछाशक्ति , प्रतिबद्धता   दूरदृष्टि  हमेशा ही महत्वकांक्षाओं की बलि चढ़ती रही !

किस पर्कार वर्ग विशेष जनकल्याण व् समान अवसरों  को खरिज कर केवल लाभ हथियाने  के लिए नीतियों  और योजनाओं से खिलवाड़ करता रहा !
विभिन  काल  खंडो मैं किस पर्कार आवश्यकताओं को सपनो का लिबास पहना कर  उल्लू सीधा करती रही ! 
आम  जन  ठग्गा रह गया !

मंगलवार, 20 मई 2014

N D A ka D N A



प्राकृतिक  आपदाओं  और निर्मित की  गयी आपदाओं  में हानि बराबर की  होती है !  २०१४  के चुनाव परिणाम से से शायद कांग्रेस के प्रतिभावान नेता और शीर्ष नेतृतव समझ पाये के अकाल कैसा होता है !
आमजन की अपेक्षाओं को नकारने की कीमत कई बरसों में चुकता होगी !

हालाँकि देश की कुल जनसँख्या के केवल १४ % समर्थन समर्थन  मात्र से ही भा ज पा  को २०१४ के चुनाव में विस्मयकारी जीत प्राप्त हुई है ! कई चैनलों से मिली खंबरों से लगता  है के आत्ममुगध  भावी प्रधानमंत्री  अब संयुक्त मोर्चे  संयोजक पद  भी  स्वयं के नियंत्रण मैं रखना चाहते है ! काया कोई  और   योग्य व्यक्ति पार्टी मैं नहीं जो ईस कर्तवय को निभा सके ?

या ये स्वयं केंद्रित सत्ता की लालसा का ही प्रतीक है ! कियूंकि जिसको विगत मैं अन्य राजनितिक दलों के व्यक्ति विशेष  के बारे मैं बड़े जोर शोर से  उजागर और प्रचारित किया गया था और इस मानदंड को नकारत्मक  बता कर  देश को नयी परिभाषा गढ़ने को परेरित किया गया था !

लोकतान्त्रिक दाल मैं व्यक्ति केंद्रित  सत्ता को स्थापित करने के सिद्धांत इतना ठोस हो चला है यह इस महवकांक्षा से स्पष्ट विदित है !

तथकथित  ज्ञान के ठेकेदार  अत्ति उत्साहित हो आर इसको भी तर्कसंगत बनाने मैं जुट गए हैं !

मंगलवार, 13 मई 2014

मिथक जब सैद्धांतिक रूप धारण करने लगते है  तब सविकारोकति के साहस  क्षीण  हो जात्ते हैं !

तब  भाव  व् तृप्ति के बीच की खाई अपना आकर ले  लेती है!

पर्ारम्भ मैं  बौद्धिकता इसे आभाव  मानती  परन्तु समय के साथ साथ यह निरन्तर विचलितता की प्रकिर्या को बढ़ा देत्ती है !
जीवन की सहजता बिखरने  लगती है!

अंतरंग उद्वेग ज्वालमुखी के रूप में कुंठाओं को उबलने लगते हैं ! संतुलन  असहज होकर डोलने लगता है तब मन क्षुब्ध्ता की ग्रिफ्त से निकल  पाता ! 
अनन्ता  मिथक हावी हो कर उद्वेग का दमन करते है   और फिरकभी न खत्म  होती टीस रगों  मैं बहने लगती है ! यह अवस्था जीवन को  अंधकार मैं धकेलने  जहां निश्ब्ध पशाताप अधूरी प्यास  को कुरेदने लगता है! और मन मेघों को तलाश मैं शुष्क होने लगता है ! 

जाने अनजाने  में ही समझौतों की परिणीति उजागर हो जीवन को भ्रम मैं डाल देती है और मिथक कभी शुद्ध तृष्णा को तृप्त  होने   नहीं देते ! तब अस्तित्व का हर अंग सवाल बन कर चुभने  लगता है ! मन तन  जीवन विपरीत दिशाओं मैं बढ़ाने लगता है ,हताशा मैं जीवन उप्पेर की और तकता है ! नीले शून्य में खुद को ढूंढने की चेष्टा  करता है ! निराशा भी अपने पाश मैं जकड  कर  लौटने को विवश कर देती है ! 

अन्तत आभाव ही शेष बचता है और उपलब्ध होता है! मिथक पूर्णता को  पराजित कर फिर स्थापित हो जात्ता है!
इस विड़म्बना को सहज कोमल  मन समझ नहीं पाता और क्षति के दर से पुरंता के अनुभव से भटक जात्ता है औचक ही नियंत्रित अनशन को सार्थक मानाने लगता है ! और ये चूक तृष्णा की तृप्ति के मार्ग अवरुद्ध कर देती है ! तब तुलनाओं में सुखद अनुभूति की तलाश तीव्र हो कर भंवर की और खींचती है  सपर्श व् तृप्ति की परिभाषाओं को वासनाओ की पूर्ति का आवरण पहना कर जीवन की सहजता को मिथक दूषिता के मार्ग पैर धकेल देता है , और जीवन  बोध  अनुभितियां केवल खोखली ही रह जत्ती है !

रविवार, 13 अप्रैल 2014

रामगढ के वासियो  झांक  कर देखो अपने अपने घरों   से !

यहाँ से २००- २००  कोस दूर गाओं मैं जब बच्चा  रात को रोता है माँ कहती है ,,,,

सो जा , सो जा नहीं तो सरदार आ जायेगा !

और ये गुलाबी गैंग  वाले , सांभा  पे केस दर्ज करवा दिए !

धिक्कार है ! बहुत  है  ये ! 

और वो   " वंशी युवराज "  मुझे  ,,,,,,,,

कही इन टोपीवालों  के मुखिया को ,,,,,,

अरे ऊ  सांभा  कब करनी है ललकार रैली !

छोड़ो  सरदार ,  अब्ब तो घाट पे ही देख लेंगे कौन  शेर  आएगा पानी पीने ! नहीं  तो १६ के बाद !

१६ के बाद क्या ??

छोड़ो  न सरदार अप्प क्यों खाम्खा  स्टैंड लेते हो !

आपसे जवाब देते नहीं बनेगा  मीडिया को , सारे  अपने थोड़ा ही न है !

आप तो अब बस बस मंत्रालय बांटो !

तू  कौन सा लेगा , तेरी किसपे नज़र है सम्भा !

मैं तो सरकार अपवाली पे ही बैठ जाऊंगा  अब वहां  खाली थोड़ा ही  न छोड़नी है !

और हाँ विदेश , कृषि, गृह  और रेल  अप्पने पास ही रखना  सरदार , नहीं तो अप्पने यहाँ  भी  बिगुल बज सकती है,  देने मैं माहिर हैं सब के सब ! 

अरे ओ कालिया   ,,,,,,,,,,,,

जी सरदार  ,,,, मैंने अपपका  नमक खाया है सरदार !

तो जा अब्ब सेटिंग कर !
 
सांभा  भाई ये किसको सेट करने को कह रहे है सरदार !

अरे वो जो कोने मैं दीदी वाली है  न , जल्दी उखड़ती है , उसको समझाने  विदेश वाली भी आइये थी एक बार ,,,   मछली खा खा के दिमाग जाली फिसलता है ! 

ध्यान से सेट करना , खाखरा  खिला दे , सरदार की  इज्जत का सवाल है ! नहीं तो धंधे के असूल जनता है ,,,,,,,,,,    एनकाउंटर !

धोलिया कहाँ है ,  कहाँ है रे धोलिया ???//

सरदार वो भी भेज दिया सेट करने दूसरे कोने वाली को ! ये फिल्म वाले पैसे से सेट होते है न !

अछ्हा ,,, ठीक है !

टोपी की कोई औकात है नहीं !

नहीं सरदार दुश्मन को कभी कमज़ोर मत  लो !बाकि आप चिंता न करो इंतेज़ाम कर दिया है उसका भी !

क्या ??????

सरदार कितनी काई  है घाट की सीढ़ियों पे नहीं देखा था !

पैर फिसल जाये  भीड़ मैं तो कोई क्या  कर सकता है ! और अब तो बहाव भी तेज है आजकल !

अछ्हा , तो सपथ मैं किस किस को बुलाना है ??/

क्या सरदार , भूल गए , वो तो ले चुके !!!!

तो १६ को क्या होगा ????

 जमा न त  सरदार !

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014





संविधान की मूल भावना के साथ क्या  पूर्ण  न्याय हो पेय या कोई भी विचारधारा इसे  सार्थक कर पायी पिछले ६६ वर्षों में ?


प्रयास जारी हैं   इसलिए एक अंतराल के बाद नागरिको ( मतदात्ताओं ) को अवसर दिया जाता है के  उसको जो उनके जीवन के लिए  नित्तियों को  जहाँ   सम्भव हो , आवश्यकता हो  परिवर्तन कर प्रासंगिकता के सार  को समझते  हुए  नित्तियों की उपयोगिता  बढ़ाये !

प्रयास  जारी  है   प्रासंगिकता  व् उपयोगिता  को समझने के ! या समझ  लिए जाने  के बाद ही उन तरीकों की खोज की जा रही  है  जिससे  आश्वासनों  पर भरोसा जगा कर सार्थकता को टाल दिया जाये ! राजनीती अज्ज के सन्दर्भ मैं इसी  कुशलता का पर्याय बन कर उभर रही है ! अन्यथा एक निश्चित समय सीमा  मैं  उदेशयो की प्राप्ति न होने के  कोई उचित व् तर्कसंगत सपष्ट  कारण  दिखाई नहीं पड़ते !

प्रयास जारी है    क्य़ोंकि  विफलताओं के सच को ढकने कि  प्रतिसपर्धा है ! विफलताएं  आश्वासनों से जनित वो भक्षी हैं जो उम्मीद के साथ साथ जीवन को भी लील रहा है !परन्तु पटकथा  के  सूत्रधार किसी भी स्तर पर स्वीकारने को तयार  नहीं !  कहें कि सच को छुपाने की कुशलता पर गौरवान्वित  महसूस करवाने मैं भी कोई कसार नहीं छोड़ते ! विचार धारा इसलिए  पूर्ण प्रवाहित न हो कर कही ठहर गयी है या बाँझ बना दे गयी है ! कोई सार्थक उत्पत्ति नहीं ! प्रगति व् विकास के नाम पर जीन की दुभारता ही दिखाई पड़ती है !

प्रयास जारी है    के अपेक्षाएं कहीं आंदोलन का  फिर से न रूप  ले लें ! इस लिए ठोस  वायदों  के घोषणापत्र जारी  होते हैं ! योजनाओं और नीतियों  को शायद इस लिए  उजागर नहीं किया जाता  ताकि सत्ता  मैं कही  चुक न हो जाये ! कियोंकि सच और प्रतिबधता  को सफलताओं कि पहुँच से परे रखने मैं ही भलाई का गणित  राजनीती के विद्यालय का मूल मंत्र है!

पर्यास जारी हैं   क्योंकि धड़कने बाद रही हैं और जीत हासिल करने के लिए पूरी क्षमताओं को झोंका जा रहा है मतदत्तों को अपनी और लुभाने के लिए ताकि  इछित परिणाम पा कर सत्ता पे काबिज हो सकें !

सत्ता  आखिर  क्यूँ  ?? व्यक्तिगत  महत्वकांक्षा  कि पूर्ति  का हठ  ??? 

जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयोजन !!!

सार्वजानिक  उत्थान  के लिए योजनाओं  के निर्माण की प्रतिबध्ता ? 

या प्रगति  कि परिभाषा को  साकार करने के प्रयास मात्र !

रविवार, 23 मार्च 2014

har har chunav !

देश मैं एक बार फिर नए  संसद सदस्यों को  चुनने के प्रकिर्या !       चुनाव !!!

 भारत  ,  संविधान  के अनुसार एक प्रजातांत्रिक  व्यवस्था का सवरूप है ! जिसमे देश के नागरिक अपने लिए उपयोगी , सुचारु  व् योजनओ में निहित वयवस्था के अंतर्गत एक सुलभ व् सहज जीवन की अपेक्षा  रखते है  और इस व्यवस्था को यथासम्भव चलने के लिए विवेकवान्  बौद्धिक क्षमताओं वाले व्यक्तियों  का चयन करने के लिए सहमत होते हैं या चयन करते हैं !

चयन करने का अधिकार प्रतेक नागरिक को को अपपनी कसौटी के मन दंड  निर्धारित करने के भी अधिकार देती है !

इस प्रकार  कि प्रकिर्या को सभी नागरिको  कि आवशकताओं , हितों , सरोकारो, समाधान के रखा के सिद्धांत पे निर्मित किया गया है!

परन्तु क्या वास्तविकता में यही हो रहा है !

या फिर ये समझने  का प्रयास किया जाये के राजनीत कुछ दलों  के विचारधारा के गुलाम बन रह गयी है!
और ये विचारधारा  मूल सिद्धांतिक  रूप से संविधानिक प्रजातांत्रिक हितों कि रक्षा का दवा तौ करती हैं लेकिन शशक होने कि प्रविर्ती को सथापित कर रही है!

शाशक  यानि  वो व्यवस्था जहाँ प्रजा के अधिकार सिमित हो जात्ते है और तंत्र हावी हो कर परजा के लिए अपने बूढी विवेक से फैसले करते है और प्रजा  उनकी पलना करने को बाध्य होती है  यहाँ नागरिकों के आवशकताओं , हितों के समाधान के रक्षा के मूल सिद्धांत का औचित्या लुप्त हो जाता है !

तो क्या  शाशकीय पर्विर्ती  विचाधाराओं का छदम चोला  ओढ़  कर स्वयं को स्थापित करते हुए 
प्रतीत नहीं होती ! अगर हाँ तौ क्या एस प्रकार के दलीय विचारधारों के सिद्धांतों व् मूल्यों पैर सवाल नहीं खड़े होते ?? या होने चाहिए!

या  बहुत चतुराई से एन सब सवालों को राजनैतिक कौशल से अनुशाशन के नाम पैर धूमिल कर दिया जाता है! इस पर गहन विचार और आंकलन करने पे देखें तो लगता यही है के किसी भी परिवेश में केवल सत्ता शाशन के महवकांक्षा को ही स्थापित कर रही है! 

अंतर केवल समय सीमा का है जो ५ वर्ष निर्धारित के गयी है!

तो क्या चुनाव अश्वानो का जश्न  मात्र  है जिसके उन्मांद में मगन हो कर अम्म नागरिक फिर ठगा सा रेह जट्टा है और अगले चुनाव कि प्रतीक्षा  करने लगता है !

रविवार, 9 मार्च 2014

चाय  !  

देश उबल  रहा है ?  

हर चाय वाले को कोई संकर्मण  हो गया लगता है !

खामखा कि बड़ाई , बेस्वाद  , जाने  कब से पतीला नहीं धोया , पता नहीं कैसी पती , जाने  कहाँ  की ,  बस ज्ञान बताने लगे हैं ! 

अरे  कौने से तक्षिला या पाटलिपुत्र के प्र्धायपक है , चाय बनानी ठीक से आयी नहीं , और चले   चंगेज खान  बनाने !

देश को चाय पे ही बैठाये  रखोगे  ? और विकास ?

 गुबारे मत फुलाओ  फट भी जाते है या उड़ जाते है हवा में अक्सर !


जब कोई स्वाद ही नहीं  तो जबर्दस्ती  की  चुस्किया  ,, झूठी सी नहीं लगाती ?

महंगाई  का आलम ,  छूटे दो नहीं तौ बाकि के ३ नहीं मिलेंगे वापस  !

संवेधानिक हो गया ?

लाचार  से  बस देखते रहो   ! सिपाही कि तरह  !

या फिर तलब  मैं आप  भी  गोता लगाओ  , गर्मी बढ़ रही है !  चुनाव भी करीब ही हैं ! 

कुछ समझे  बाबू !

हाँ बाबू से  से ज्यादा  अपने को कुछ समझने का भ्रम मत  पाल लेना। 

अभी राजनीती के लिए  तुम्हारी अकल कच्ची ही है. !

बाकि फिर भी स्वाद लेना  है तौ खा लो लिज़ज़त पापड़ !

अब जहाँ भी जाओ  इक  टेकरी पे चाय वाला मिल ही जायेगा !

धयान से   , कहीं लत लग गयी  , हाँ  कहीं कहीं चाय में  कुछ  ????

ये विकास कि गाथा  चुनाव के समय ही क्यूँ  गायी जाती  हैं  इसका  जवाब

नहीं चंगेज खान के पास ! 

दाग  अच्छे हैं ! 

चुनाव के  मौसम  में !

उभर उभर कर  कहते हैं अपनी कहानी  !

किसने  गुजारी धुलने  में जवानी  !

अब तो समझो  इनकी  जुबानी   !

अगर धोओगे तो  फिर  पछताओगे  !

पहले ही कम है देश  में  पानी   !

क्यूँ  छेड़ते  हो राग  नया  !

अरे सुनो  वही धुन पुरनी  !

दाग अच्छे  है !

मत करो  नादानी  ! 

इस में  किसी षड्यंत्र  / बाहरी  ताकतों  का हाथ लगता है   आप  को  !!!! 

निरमा   !  गुजरात मैं बनता है !

सर्फ  का प्लांट भी है  वहाँ एक !

ऐरियल  !   दबंग  दबंग  !

घडी का अभी वो रुतबा नहीं नहीं !

वहा  री  राजनीती  !