रविवार, 23 मार्च 2014

har har chunav !

देश मैं एक बार फिर नए  संसद सदस्यों को  चुनने के प्रकिर्या !       चुनाव !!!

 भारत  ,  संविधान  के अनुसार एक प्रजातांत्रिक  व्यवस्था का सवरूप है ! जिसमे देश के नागरिक अपने लिए उपयोगी , सुचारु  व् योजनओ में निहित वयवस्था के अंतर्गत एक सुलभ व् सहज जीवन की अपेक्षा  रखते है  और इस व्यवस्था को यथासम्भव चलने के लिए विवेकवान्  बौद्धिक क्षमताओं वाले व्यक्तियों  का चयन करने के लिए सहमत होते हैं या चयन करते हैं !

चयन करने का अधिकार प्रतेक नागरिक को को अपपनी कसौटी के मन दंड  निर्धारित करने के भी अधिकार देती है !

इस प्रकार  कि प्रकिर्या को सभी नागरिको  कि आवशकताओं , हितों , सरोकारो, समाधान के रखा के सिद्धांत पे निर्मित किया गया है!

परन्तु क्या वास्तविकता में यही हो रहा है !

या फिर ये समझने  का प्रयास किया जाये के राजनीत कुछ दलों  के विचारधारा के गुलाम बन रह गयी है!
और ये विचारधारा  मूल सिद्धांतिक  रूप से संविधानिक प्रजातांत्रिक हितों कि रक्षा का दवा तौ करती हैं लेकिन शशक होने कि प्रविर्ती को सथापित कर रही है!

शाशक  यानि  वो व्यवस्था जहाँ प्रजा के अधिकार सिमित हो जात्ते है और तंत्र हावी हो कर परजा के लिए अपने बूढी विवेक से फैसले करते है और प्रजा  उनकी पलना करने को बाध्य होती है  यहाँ नागरिकों के आवशकताओं , हितों के समाधान के रक्षा के मूल सिद्धांत का औचित्या लुप्त हो जाता है !

तो क्या  शाशकीय पर्विर्ती  विचाधाराओं का छदम चोला  ओढ़  कर स्वयं को स्थापित करते हुए 
प्रतीत नहीं होती ! अगर हाँ तौ क्या एस प्रकार के दलीय विचारधारों के सिद्धांतों व् मूल्यों पैर सवाल नहीं खड़े होते ?? या होने चाहिए!

या  बहुत चतुराई से एन सब सवालों को राजनैतिक कौशल से अनुशाशन के नाम पैर धूमिल कर दिया जाता है! इस पर गहन विचार और आंकलन करने पे देखें तो लगता यही है के किसी भी परिवेश में केवल सत्ता शाशन के महवकांक्षा को ही स्थापित कर रही है! 

अंतर केवल समय सीमा का है जो ५ वर्ष निर्धारित के गयी है!

तो क्या चुनाव अश्वानो का जश्न  मात्र  है जिसके उन्मांद में मगन हो कर अम्म नागरिक फिर ठगा सा रेह जट्टा है और अगले चुनाव कि प्रतीक्षा  करने लगता है !

रविवार, 9 मार्च 2014

चाय  !  

देश उबल  रहा है ?  

हर चाय वाले को कोई संकर्मण  हो गया लगता है !

खामखा कि बड़ाई , बेस्वाद  , जाने  कब से पतीला नहीं धोया , पता नहीं कैसी पती , जाने  कहाँ  की ,  बस ज्ञान बताने लगे हैं ! 

अरे  कौने से तक्षिला या पाटलिपुत्र के प्र्धायपक है , चाय बनानी ठीक से आयी नहीं , और चले   चंगेज खान  बनाने !

देश को चाय पे ही बैठाये  रखोगे  ? और विकास ?

 गुबारे मत फुलाओ  फट भी जाते है या उड़ जाते है हवा में अक्सर !


जब कोई स्वाद ही नहीं  तो जबर्दस्ती  की  चुस्किया  ,, झूठी सी नहीं लगाती ?

महंगाई  का आलम ,  छूटे दो नहीं तौ बाकि के ३ नहीं मिलेंगे वापस  !

संवेधानिक हो गया ?

लाचार  से  बस देखते रहो   ! सिपाही कि तरह  !

या फिर तलब  मैं आप  भी  गोता लगाओ  , गर्मी बढ़ रही है !  चुनाव भी करीब ही हैं ! 

कुछ समझे  बाबू !

हाँ बाबू से  से ज्यादा  अपने को कुछ समझने का भ्रम मत  पाल लेना। 

अभी राजनीती के लिए  तुम्हारी अकल कच्ची ही है. !

बाकि फिर भी स्वाद लेना  है तौ खा लो लिज़ज़त पापड़ !

अब जहाँ भी जाओ  इक  टेकरी पे चाय वाला मिल ही जायेगा !

धयान से   , कहीं लत लग गयी  , हाँ  कहीं कहीं चाय में  कुछ  ????

ये विकास कि गाथा  चुनाव के समय ही क्यूँ  गायी जाती  हैं  इसका  जवाब

नहीं चंगेज खान के पास ! 

दाग  अच्छे हैं ! 

चुनाव के  मौसम  में !

उभर उभर कर  कहते हैं अपनी कहानी  !

किसने  गुजारी धुलने  में जवानी  !

अब तो समझो  इनकी  जुबानी   !

अगर धोओगे तो  फिर  पछताओगे  !

पहले ही कम है देश  में  पानी   !

क्यूँ  छेड़ते  हो राग  नया  !

अरे सुनो  वही धुन पुरनी  !

दाग अच्छे  है !

मत करो  नादानी  ! 

इस में  किसी षड्यंत्र  / बाहरी  ताकतों  का हाथ लगता है   आप  को  !!!! 

निरमा   !  गुजरात मैं बनता है !

सर्फ  का प्लांट भी है  वहाँ एक !

ऐरियल  !   दबंग  दबंग  !

घडी का अभी वो रुतबा नहीं नहीं !

वहा  री  राजनीती  !