शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

बलिदांन और पाखंड के दोराहे पे खड़ा लोकतंत्र

 ये  ज़रनैली  सड़क  है साहेब , 

तारीखी  अज्म  से मुलविस , 


इसके इकबाल और जलाल  की  मीनारें  गवाह  हैं  शहँशाहों  हुकमरानो के नापाक मंसूबों की !


ये  आवांम  की  शहादतों  मे  मगनून आज भी ज़िन्दा  है ! 


भारत मे अलग अलग दौर मे बहुत  से  संघर्षों  की  दास्ताने  समेटे  हुये  है ,यहीं से गुजरे हैं  सत्ताओं के  परिवर्तनो  के  काफिले ! 


तक्षषिला  और  पाटल्लीपुत्र  को जोड़ती भी है ! 


सचखण्ड के सरोवर की पवित्रता और आकालतख्त के शब्दों  के  होंसलों को मोक्ष के  घाटों  से  मिलाती  भी है ! 


आवांम  की  त्वक्को  के  मनफी  माजाक  की  कीमतें भी  दर्ज हैं इसके  मोडों  मे !  


किनारों पे खडे  खामोश  पेडों  से  ही  एक  बार  मशविरा कर  लिया  जाये , हकीकतों  के  जाने  कितने फलसफे  खुल जायेंगे ! 

 

ये  ज़रनैली  सड़क  हमेशा  आवांम के साथ ही  रही है , सत्ताओँ  को  मात  देते  हुये !


मौसमों  के  अफसाने  इसके  हर संग ओ मील पे  दर्ज हैं !


इसकी पनाह  मे  मीलों  तक खेत खलिहान  बसे हुये हैं ! अनाज  इसी  जरनैली  सड़क  से  अपने  मुकाम  तक  पहूँचता  है !


मेहनत की  ईबारत  है  ये  तिजारत  की  रहगुजर नहीं  ये  ज़रनैली  सड़क  ! 

साहेब , इसके बांकपन ने  परचम  लहराये हैं  और इसके  गर्द ओ गुबार  ने  अहंकार  मिटाये  हैं ! 


तारीख गवाह  है  !

षडय़न्त्रों  की  जैसे  जैसे परतें खुलेंगी  , 

वैसे वैसे परींणाम भी तय होने  लगेंगे  !

सोमवार, 28 मार्च 2016

मिथक जब सैद्धांतिक रूप धारण करने लगते है  तब  स्वीकारोक्ति  के साहस  क्षीण  हो जाते  हैं !
तब  भाव  व् तृप्ति के बीच की खाई अपना आकर ले  लेती है!
पर्ारम्भ में   बौद्धिकता इसे आभाव  मानती  परन्तु समय के साथ साथ यह निरन्तर विचलितता की प्रकिर्या को बढ़ा देती  है !  जीवन की सहजता बिखरने  लगती है !
अंतरंग उद्वेग ज्वालमुखी के रूप में कुंठाओं को उबलने लगते हैं ! संतुलन  असहज होकर डोलने लगता है तब मन क्षुब्ध्ता की ग्रिफ्त से निकल नहीं  पाता ! अंतता   मिथक हावी हो कर उद्वेग का दमन करते है   और फिर कभी न खत्म  होती टीस रगों  मैं बहने लगती है ! यह अवस्था जीवन को  अंधकार मैं धकेल देता है   जहां निश्ब्ध पशाताप अधूरी प्यास  को कुरेदने लगता है ! और मन मेघों को तलाश मैं शुष्क होने लगता है ! जाने अनजाने  में ही समझौतों की परिणीति उजागर हो जीवन को भ्रम मैं डाल देती है और मिथक कभी शुद्ध तृष्णा को तृप्त  होने   नहीं देते ! तब अस्तित्व का हर अंग सवाल बन कर चुभने  लगता है ! मन तन  जीवन विपरीत दिशाओं मैं बढ़ाने लगता है ,हताशा में  जीवन ऊपर  की और तकता है ! नीले शून्य में खुद को ढूंढने की चेष्टा  करता है ! निराशा भी अपने पाश मैं जकड  कर  लौटने को विवश कर देती है ! अन्तत आभाव ही शेष बचता है और उपलब्ध होता है ! मिथक पूर्णता को  पराजित कर फिर स्थापित हो जाता  है!
 इस विड़म्बना को सहज कोमल  मन समझ नहीं पाता और क्षति के डर  से पूर्णता  के अनुभव में  भटक जाता  है औचक ही नियंत्रित अनशन को सार्थक मानाने लगता है ! और ये चूक तृष्णा की तृप्ति के मार्ग अवरुद्ध कर देती है ! तब तुलनाओं में सुखद अनुभूति की तलाश तीव्र हो कर भंवर की और खींचती है ! तब सपर्श व् तृप्ति की परिभाषाओं को वासनाओ की पूर्ति का आवरण पहना कर जीवन की सहजता को मिथक दूषिता के मार्ग पर  धकेल देता है , और जीवन  बोध  अनुभितियां केवल खोखली ही रह जाती  है !
कष्ट की स्थिति या उसके भय से मुकति के प्रयास  में जो भी स्त्रोत सार्थक प्रतीत होता है वही आस्था का प्रतीक  उभरता है !
 क्षीण आत्मबल वही  संपर्पण कर विश्वास के भर्म  की नयी चादर ओढ़ लेता है ! यही परम से नेता टूटता है और भर्म  के मायावी महल का आकर्षण  हावी होने लगता है , यहाँ भर्म भेद को निगल जाता है !
यही पर  वास्तविकता के उजालों से  विपरीत अंधकार की यात्रा आरम्भ होती है ! भर्म का अहसास हमेशा सुखद लगता है और यही विवेक पर  भी विराम लगता है ! ज्ञान के दीप  में  तर्क की बाती  बुझने लगती है !
एक नए कारोबार की शुरुआत होती है जहाँ मुनाफा  ही उदेशय होता है , कीमत का कोई औचित्य नहीं !
आखिर कियूं जल उठा हरियाणा !  आरक्षण या  साज़िश !



सम्पूर्ण विकास का वायदा करके स्थापित हुई बीजेपी सरकार आखिर कियूं समय रहते प्रदेश में व्यापत आक्रोश को समझने में नाकाम रही ! कई सवालों के साथ साथ ये भी समझना बहुत आवश्यक  है ! हरियाणा में जो हुआ उसको सही तरीके से समझने के लिए सत्ता परिवर्तन और सत्ता एकाधिकार  की पृष्ठभूमि को जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है !  हरियाणा गठन के ५० साल बाद तक भी  यहाँ  बीजेपी का कभी आधार बन नहीं पाया ! कभी भी बीजेपी के हिंदुत्व हार्ड लाइन एजेंडे को हरियाणा में स्वीकारोक्ति नहीं मिली ! अधिकतर सत्ता  पर जाटों का ही वर्चस्व रहा ! गैर जाट मुख्यमंत्री भजन लाल ने भी जाटों की कभी अनदेखी नहीं की !



लेकिन कांग्रेस की निरन्तर विफलाओं और पारंपरिक विपक्षी पार्टी इ ने लो के सुप्रीमो के जेल में चले जाने से उत्पन हुयी स्थिति में जिस प्रकार बीजेपी को  भरपूर समर्थन सभी ३६ बिरादरियों और खास कर जाटों से एक तरफा मिला और बीजेपी ने सफलता पायी थी उसको बीजेपी अपना स्थाई गढ़ बनने में जुट गयी ! लेकिन बीजेपी प्रदेश में जाट नेत्र्तव को स्थापित नहीं कर पाई ! उसको बीजेपी संतुलन में लाने में कहीं चुक गयी  !  

पिछली कांग्रेस सरकार ने भी जाटों को आरक्षण का वादा करके सत्ता पाई थी लेकिन अपने १० साल के कर्यकाल में केवल अंतिम एक साल में ही उस पर काम किया और उसकी सन्तुति के लिए उसे केंद्र सरकार के भरोसे छोड़ दिया जिसको बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया ! जब से प्रदेश में नयी सरकार का गठन हुआ तब से जाट अपने हक के लिए कई बार मुख्यमंत्री से मिले लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिलने के चलते जाटों में उपेक्षा का भाव  व् असंतोष बढ़ने लगा था !
विकास को गति देने के लिए नए निवेश की संभावनाओं के तहत विदेशी कम्पनियों को निमंत्रण ,  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अभियान को साकार करने के सपने देख रही सरकार यकायक एक नए भंवर में फस गयी ! प्रशाशनिक अनुभवहीनता की छाप सरकार के कार्य पे पडने भी लगी थी ! विधायक दल के अलग अलग गुटों में भी मुख्यमंत्री की कार्यशैली  को ले कर मन मुटाव सतह पर आता रहा ! दूसरी जाति के गुट जाट प्रतिनिधियों के खिलाफ लामबंद होते रहे और बार बार जाट बहुलता पे सवाल  खड़े करने से नहीं चूके !  १.५ साल बीतने पर भी जब सरकार के काम के तरीके से आमजन का मोह भी भंग होने लगा था कियूंकि प्रदेश में फसलों के हुए नुकसान और मुआवजों में की बन्दर बाँट समय पे खाद बीज की उपलब्धता का न होना सिंचाई की वयव्स्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन की विफलता भी कृषक समाज को फिर से सोचने पे मजबूर करने लगी थी ! 


हरियाणा और हरयाणवी जाटों को समझना बहुत साधारण है कियूंकि सवभाव से सरल और मेहनतकश ये वर्ग सामाजिक सहयोग को हमेशा मानता आया है ! अपनी मेहनत के बल पर ही पिछले दशकों से ये प्रदेश देश के समृद्ध प्रदेश और प्रति व्यक्ति आय में सर्वोपरि बना है ! करीब २.५ करोड़ की जनसंख्या वाला ये प्रदेश देश की कुल आबादी का केवल २ % ही है लेकिन देश के लिए ७५ % से ज्यादा ओलिंपिक / एशियाड  मैडल ये प्रदेश  अर्जित करता है वो भी ज्यादातर मुक्केबाजी कुश्ती और अब बैडमिंटन(सायना नेहवाल) ! एक  तथ्य भी है सभी माडल जीतने वाले महिला  पुरुष खिलाडी व भारतीय सेनाओं में जवान से ले कर अधिकारी जाट ही है ! भारतीय सेना भी हरियाणा की महिलाओं का योगदान सबसे अधिक है वर्तमान में ऑफिसर के रूप में ! यहाँ की कृषि और पशुधन की उत्पादकता  भी सबसे अधिक है !  यहाँ एक कहावत बहुत प्रचलित है " जाट मरया  जब जानियो जब तेहरवी हो ले " ! अपनी धुन और लगन के पक्के जाट हमेशा ही देश की सुरक्षा में बलिदान देते रहे ! सहस शौर्य  के प्रतीक जाट बौद्धिक और राजनितिक तौर भी समृद्ध है !


करीब २३ साल पहले भी जाटों ने आरक्षण की मांग को लेकर वोट क्लब पे प्रदर्शन किया था तब लगभग २ लाख जाट वह इक्क्ठा हुए थे ! लेकिन किसी को कभी कोई नुकसान नहीं पंहुचाया और न ही कभी इस तरह की कोई घटना हुई ! हरियाणा के अस्तित्व में आने के ५० ( १९६६-२०१६)साल तक ये प्रदेश मेहनत को मूल मंत्र  मानता रहा !बंसी लाल के कार्यकाल में  हरियाणा ने  अभूतपूर्व विकास किया ! नए शहर एवं उद्योग  विकसित हुए !

       हरियाणा ने   राजस्थान के बॉर्डर से लगाते हुए  कुछ दक्षिणी जिले जो सूखे और पिछड़े माने जाते थे और जहाँ कोई राजनितिक बौद्धिकता भी नहीं थी  को भी विरासत स्वीकार किया !  हरियाणा ने   पंजाब से अलग होने के बाद  पंजाबी समुदाय ( १९४७ के विस्थापित शरणार्थी  पंजाबी वर्ग } को सम्मान पूर्वक  स्वीकारते  हुए यहाँ समाहित किया ! जो अब हरियाण की लगभग २६ % जनसँख्या  है ! ये  वर्ग  हरियाणा की राजनीती में धीरे धीरे सकिर्य भी हुए और आगे  भी बढे लेकिन सत्ता के निर्धारण में इनकी भूमिका  नगण्य ही रही ! वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर  भी उसी समुदाय से आते  हैं ! 

रविंदर ढुल ,  चेयरमैन , सेंटर फॉर सोशिओ लीगल रिसर्च एंड  ऐड  के अनुसार 
" सत्ता परिवर्तन के साथ ही पहचान के लिए बढ़ती महवकाक्षा  के  तहत कई संकेत  इस प्रकार  के स्थापित किये जाने लगे जो  साफ तौर पे जाटों के सम्मान  को चुनौती देते दिखाई  पड़ने लगे  ! हरियाण में बेटी बचाओ अभियान की  ब्रांड अंम्बेसडर परनीति  चोपड़ा को बनाने से लेकर नए मुख्या सचिव की नियुक्ति या फिर कुरुक्षेत्र के संसद राजकुमार सैनी के ओ बी सी  ब्रिगेड बनाने और जाटों को चुनौती देने के  वक्तव्य हो या  सवास्थ्य मंत्री के तीखे तेवर  कोई  भी अवसर नहीं चूका गया !"

श्याम  गोदारा , प्रसिद्ध  क्रिमिनल वकील  का मानना  है के
" हरियाणा के सभी जिलों में जाट आरक्षण  की मांग बराबर रही  और अधिकतर जिलो में प्रदर्शन  शांति पूर्वक ही चला !  लेकिन अबकी बार सभी जाट समुदायों से और खाप के मुखियाओं  से एक भूल हुयी  है के उन्होंने पहले ही आरक्षण के आंदोलन में होने वाले उपदव के षडयंतर को नहीं पहचाना और  इसमें हिंसा होने की सम्भावनाओ के चलते घोषणा नहीं की के अगर कोई भी हिंसा हुई तो आंदोलन वापिस ले लिया जायेगा ! जिसका फायदा  षडयंतरकारी तकताओं ने उठाया और हरियाणा में जातिवाद का जहर घोल कर सदियों से चली आ रही  सदभावना और भाईचारे की परम्पराओं को छिन भिन कर दिया ! ये एक तरह  से जाटों  को बदनाम करने की घिनोनी साज़िश लगाती  है !"

हरियाण में सरकार ने भी समय रहते इस  मुद्दे पर  कोई गंभीरता नहीं  दिखाई ! प्रदेश के पुलिस डी जी  पी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में  कई स्थानो पे पुलिस के उच्च अधिकारीयों  की विफलता को स्वीकार करना भी किसी पूर्व नियोजित योजना की और इशारा करता  है ! जिस प्रकार रोहतक  जहाँ सबसे पहले हिंसा भड़की और  हिंसा हुयी पुलिस रेंज के आई जी , श्री कांत जाधव का निलंबन व् अन्य अधिकारीयों को आनन फानन में स्थांतरित किया गया  वो सरकार की कार्यशैली को संदेह के घेरे में साफ तौर पे लाती  है !अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) पी के दास ‘यह रोहतक में आंदोलन और संबंधित हिंसा नियंत्रित करने में कर्तव्यों का ठीक तरीके से निर्वहन नहीं करने के आरोपों के आधार पर किया गया है।’

ऑल इंडिया जाट आरक्षण संगठन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक ने कहा, ‘हरियाणा सरकार की ओर से कोई ठोस प्रस्ताव नहीं दिया गया है। भाजपा सरकार जाटों को मूर्ख बनाने का प्रयास कर रही है क्योंकि जाटों को आरक्षण देने के संदर्भ में उसके इरादे ठीक नहीं हैं।’ सर्वदलीय बैठक के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि जाट को आरक्षण देने के लिए विधेयक का मसौदा तैयार करेगी और इस संदर्भ में सभी दलों से सुझाव मांगे हैं।
यशपाल  मलिक ने कहा, ‘जाटों को आरक्षण देने में सिर्फ मुख्यमंत्री को समस्या है। भाजपा में शेष नेता आरक्षण देन के पक्ष में हैं।’ उन्होंने आरोप लगाया, ‘खट्टर की जातिवादी मानसिकता है क्योंकि वह जाट नहीं है। वह खुद को गैर जाट नेता के तौर पर साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।’

भूतपूर्व मुख्य  मंत्री भूपेंदर सिंह हुडा , वर्तमान वित्त  मंत्री  कै  अभिमन्यु  के गृह नगर रोहतक , जहां  पंजाबी समुदाय का शहरी व्यापारी  जनसख्या  में बाहुल्य है और स्थानीय विधायक मनीष ग्रोवर है जिनका कै अभिमन्यु  से  ३६ का आंकड़ा जग जाहिर है  से  हिंसा  के केंद्र का उभारना भी आश्चर्यजनक है ! विशेष वर्ग के लोगो के द्वारा जाटों के प्रति  भ्रामक प्रचार और गोलबंदी के परिणाम  इतने घातक  होंगे ये कभी प्रदेश सरकार  ने सोचा न होगा ! या फिर  ये सब  राजनितिक पृष्ठभूमि की नयी ज़मीन को बनाने की कवायद की सोची समझी रणनीति का हिस्सा  समझा जाये ! जाटों को आरक्षण का लाभ  देने में और  उनकी मांगो का यथोचित समाधान करने में प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता व् उपेक्षा का  साफ कारण  और जाट प्रतिनिधियों को संतोषजनक जवाब ने देने की स्थिति भी इस आंदोलन की पृष्ठभूंमि से अलग नहीं  ! जबकि अन्य राज्यों में जाटों को आरक्षण का लाभ पहले से प्राप्त  है !

जाटों में आरक्षण के लिए संघर्ष  नयी सदी में बदलाव व् बढ़ती जनसख्या और घटे संसाधनो से उपजी  सामजिक विषमताओं  तथा कृषि खेती में घाटे  का सौदा होने  से सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के संकट से उत्पन हुआ है ! केवल ५ % जाटों के पास समुचित जमीन है बाकि  ९० % जाटों  के पास अब उतनी भूमि नहीं रही के उदारीकरण और उपभोगता वाद के दौर में  वो पुरे परिवार का भरणपोषण कर सके ! इसके पीछे और भी कई सामाजिक विषमताएं वयापत हैं ! शिक्षा  के लगतार  निज़करण से बढ़ती खर्चीली पढ़ाई , स्वास्थ्य सेवाएं  व् राजगार में प्रतिस्पर्धा  भी मूल  कारणों में है !दरअसल गहराता आर्थिक संकट और विकास का मौजूदा मॉडल उन समुदायों को भी आरक्षण की और धकेल रहा है जिस को लेने की कुछ दशकों पहले अपनी जरुरत नहीं समझते थे !







2015  एक और साल  विशेष  उपलब्धियां न कर पाने  के मलाल में लगता है कुछ  निराश सा गुजर रहा है ! 

कुछ साल अपनी गौरवपूर्ण उपलब्धियों के कारन हमेशा के लिए  इतिहास में अपनी जगह बना लेते है ! उनकी छाप दशको , सदियों , तक चेतना , चिंतन , व् विचारों में गूंजती है !
कुछ साल घटनाओ के साक्षी  की भूमिका में रहते हैं ! वहीं  कुछ साल एक तरह की बेबसी में रहते हुए  दर्द और निराशा  के दौर से गुजरते हैं !

काल खंड देश व् परिस्थितिया भिन्न भिन्न होने के कारण घटनाये भी भिन्न भिन्न है और उनके प्रभाव भी !कोई भी समाज या संस्कृति उस प्रभाव से अछूती नहीं रह पाती , हालाँकि प्रभाव की अवधि तात्कालिक या  दीर्घकालिक हो सकती है ! कुछ प्रभाव प्रत्यक्ष रूप  से मानवीय समाज  को जागृत करते है कुछ अपर्त्यक्ष रूप में ! 
कुछ नयी अवधारणाओं , चेतनाओं व् परिभाषाओं की  नींव रखते है जबकि कुछ पुरानी पृष्ठभूमि के संग ही  आगे बढ़  जाते है !  महत्व के आधार पर ही साल अपनी पहचान बना पाते है !
२०१५ को अनोखी सफलताओं का साल तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ अप्रिय विफलताएं इसके खाते  में जुड़ जरूर गयी हैं ! जिस होंसले की  उड़ान पे ये साल निकला था वह भी अपनी मंज़िल तक पहुँच न पाने की कसक लिये है ! ऊर्जा के स्तर पे भी  सामाजिक , व्यापारिक  क्षेत्रों में  कुछ खास उत्साहजनक बृद्धि देखने में  नही  आयी ! 
राजनितिक स्तर पर भी कई मुद्दे इसकी ताकत की पकड़  से बहार ही रहे ! मंहगाई , बेरोजगारी, आंतकवाद  को  काबू करने में साल लगभग विफल ही  कहा  जा सकता  है !
फतेहबाद प्रकरण क्या उजागर करता है  ! 

बात यहाँ सम्मान या अपमान की नहीं परंतु क्षमता व् अक्षमता , कार्यशैली  में अतिवादिता एवं महत्वकांक्षा की ज्यादा है !
पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल को अगर प्रशाशन पर मजबूत पकड़ और अधिकारीयों को सख्त निर्देशों , व् समयबद्ध प्रगति के लिए याद किया जाता है तो आज के दौर में इस प्रकार की मजबूती को स्थापित करने के प्रयास असंगत कैसे मान  लिए जाये !
सत्ता  सरक्षण देने के लिए नहीं चुनी जाती वरन आम जन के सामूहिक हितो को समयबद्ध उपायों से रक्षित करने के लिए चुनते है !यही लोकतंत्र का मूल भावना और कार्यशैली भी है !
उसमे किसी मत्वकांक्षा विशेष की गुंजाइश नहीं होती ! लेकिन साथ ही गरिमापूर्ण व्यवहार व् जवाबदेही की भी प्रतिबद्धता निश्चित है ! यह घटना एक घटना मात्र नहीं बल्कि मनोदशा का भी साक्ष्य है ! एक क्षेत्र में प्रयासों से उब्लब्धि हासिल करने का अर्थ यह नहीं की अप्प सर्वेसर्वा है और आप की वयक्तिगत महत्वकांक्षा संविधान द्वारा निहित कार्यक्षेत्र में गरिमापूर्ण शालीनता से उच्च हो सकती है !
संविधान  द्वारा जो अधिकार निश्चित किये गए है उनका उदेश्य जनहित के लिए कार्य करना है न की  अपनी  पूर्वाग्रहित दृष्टिकोण से प्रेरित  मत्वकांक्षा की पूर्ति !
सामन्य नागरिको समूह  जो अपनी बेदना  या समस्या को जब शीर्ष के सामने ले जाता है तो वो उन परिस्थियों से जूझने के बाद जब हल न मिले तब आगे बढ़ता है न की   प्रायोजित होता है !
 अपने क्षत्र में होने वाली  असमाजिक कामो और उनसे होने  वाले बुरे प्रभावों को दूर करना या करवाने का   सामूहिक प्रयास हर समाज में किया जाता है ! उस पर  नियंत्रण  और अंकुश लगाने  का प्रावधान बनाये गए कानून के तहत ही  नियुकत अधिकारी को प्रदत  किये जाते हैं ! अधिकारी जनसेवक के रूप में काम करने के लिए नियुक होते है जिसके लिए उनको उचित सुविधाये व् संसाधन  भी मिलते हैं ! अक्सर ऐसा देखा गया है के कुछ अधिकारी आम नागरिको से स्वयं को बहुत श्रेष्ठ मानकर उनके प्रति पूर्वाग्रहित हो कर ही दोयम दर्जे  से व्यव्हार करते हैं !जबकि उनको अधिकार नागरिको की संशयों , समस्यां के समाधान करने के लिए मिलती है  जिनका वो स्वामित्व स्वयं के लिए  मान लेते है !  सरकारी अधिकारीयों में  समाधान करने की क्षमता , जवाबदेही की अनिवर्यता  को अनदेखा कर अपनी सुविधाओं को जुटाने की प्रविर्ती अधिक देखने में आती  है जिसके प्रति अक्सर जम  समूहों में रोष पाया जाता है ! जबकि अधिकारीयों में एक व्यापक  संवेदनशील दृष्टिकोण  को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है जिससे कार्यों को करने में   अधिक सहजता हो !
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नागरिको , प्रतिनिधियों और अधिकारीयों में एक विशेष संतुलन की आवश्यकता भी अनिवार्यता भी ! जब  भी इस प्रकार का द्वन्द सामने प्रकट  होता  उसका निराशाजनक प्रभाव ही   समाज को उद्वेलित  करता है ! किसी भी लोकतान्त्रिक वयवस्था में नागरिको की सकिर्य भागीदारी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता , और अधिकारीयों की भूमिका व् जवाबदेही  कार्यो में सहायक के रूप में तय होती है ! नागरिक ही  अपनी प्राथमिकताएं तय करते है जिनके लिए उन्होंने जनप्रितिनिधियों को उन नीतियों के किर्यान्वन के लिए के लिए चुना है ! प्रजातंत्र की सफलता में अह्कारियों से महत्वपूर्ण  योगदान की अपेक्षा की जाती जो एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है ! वहीं  दूसरी और जनता दवरा चुन कर आये प्रितिनिधियों से , सरकार में  विशेष पद पर स्थापित मंत्रियों  से भी  बहुत सयम और सहनशीलता की अपेक्षा होती है ! वो  अधिकारीयों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत होते है , प्रताड़ना का नहीं ! किसी भी राजनैतिक दल  के वैचारिक मूल्यों  से प्रेरित हो कर संतुलन संभव नहीं ! राजनेता के आचरण में व्यपक्ता का आधार अनिवार्य है !
सवाल विकास का या पिछड़ेपन का नहीं , सवाल राजनितिक उदेश्य का है !
राष्ट्र किस रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहता है सवाल उस उदेश्य का है !

केवल सतही सवालों के समाधान खोजना राजनीती की परिभाषा  मात्र  नहीं है !सवाल व्यपक्ता की पृष्ठभूमि में कही गहरे में है  जिन्हें एक महत्वकांक्षा विशेष के अंतर्गत अनदेखा किया जा रहा है !
 सवाल व्यापक राष्ट्रीयता का है , व्यापक जन  कल्याण का है जिस दबाने के लिए  पूंजीवाद ने राजनैतिक विचारधारा की आँखों पे बड़ी चतुराई से पट्टी बांध  दी है  और जिसको उतरने में अब  स्वयं राजनीती को भी डर  लगाने लगा है !
भारतीय  स्वाधीनता संग्राम से स्वतंत्रता प्राप्ति  , संविधान की स्थापना के प्रयास केवल सत्ता स्थापित करने के सिद्धांत को परिणित करने के लिए नहीं किये गए थे !अपितु राष्ट्र की व्यापकता , अखंडता , सहिष्णुता को मूल में रख कर स्वयंनिर्भरता  व् प्रगति के लिए किये गए थे ! जो आज के दौर में सत्ता के लिए बढ़ती महत्वकांक्षा के साथ लुप्त पराए हो चुकी है !
गतिरोध की राजनीती सहयोग के सिद्धांत को धत्ता घोषित करने पे तुली है !विभिन राजनैतिक विचारधाराओं ने जिस प्रकार एक राष्ट्र की परिकल्पना को प्रस्तुत किया है व ही गतिरोध का मूल  मुख्य कारन यही जिसके चलते सियासत ताकत का प्रतीक बन कर रह गयी है !
पूंजीवाद हमेशा आंकड़ों की बाज़ीगरी को प्रोत्साहित करता रहा है और यही उसकी ताकत भी है ! अगर इन आंकड़ों से बहार निकल कर देखा जाये तो देश की स्थिति आज भी संतोषजनक स्तर से कही कोसो दूर ही है ! जन कल्याण की विभिन योजनाओ को नौकरशाही ने अपनी लोलुप मनोवृति से किस तरह  ठिकाने लगाया इसका उदाहरण हर 5 वर्षीय  योजनाओ की विफलताओं से साफ  है !
विभिन  राजनितिक  विचारधाराओं , परिभाषाओं  व् महत्वकांक्षाओं ने निरन्तर  व् समग्र विकास को बार बार बाधित किया है ! ये त्रासदी हर दौर  और दशक में  राजनितिक उदेश्यों  को लीलती रही है ! देश का उपेक्षित वर्ग दो जून की रोटी की जदोजहद से उभर नहीं पाया ! स्वयंनिर्भर प्रगति का संग्राम  सियासत के खेल में बदल कर यह गया !
राष्ट्रिय शक्ति व् चेतना को जिस उदेश्य के लिए स्वतंत्रता संग्राम से जागृत किया किया गया था वह जिस प्रकार  से पथभ्रष्ट हुयी है इसका बोध आज भी किसी को चिंतित नहीं करता ! व्यापकता और सहमति को खंडित करने के प्रयोग से समाज  की दिशा दिन ब  दिन भ्रमित हो रही है ! एक नए प्रकार की घृणा व् डर अपना वर्चस्व बना रहा है ! परिवर्तन  के बहाव  को भौतिकतावाद ने अपने लाभ के लिए किस और मोड़ दिया  के , पारिवारिक , समाजिक , नैतिक , राजनितिक  मूल्यों का अवघटन तीव्रता से जारी है !
    देश के विभिन प्रदेशों में स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिंक दल भी प्रगति में समग्र योगदान में विफल ही रहे हैं !निर्धारित समय में शक्ति प्रदर्शन  इतर कोई उपलब्धि उनके खाते में है नहीं ! जन कल्याण की नीतियों पे अधिनायकवाद ,निजी स्वामित्व , महिमा मंडन की परम्परा हावी होती चली गयी ! धर्म को राजनितिक लाभ के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा !
आरोप प्रत्यारोप ही आज की राजनीती की परिभाषा बन चुके है ऐसे में  में जो आशंका का वातावरण  बना है उसमे प्रगति व् कल्याण की उम्मीद करना कहाँ तक सार्थक है !

बुधवार, 25 जून 2014

भारत  के   राजनैतिक इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है के जन  कल्याण के कुछेक सफल प्रसंगों को छोड़ कर बाकि   ज्यादातर नीतियों , नेताओं , योजनाओं  की असफलताओं का ही वर्णन  है!
देश के निर्माण , विकास, मजबूती, और सुरक्षा के पहलुओं  पर  गर्व करने लायक कुछ भी नहीं है !
या यूँ कहे के अधिकाँशतय  नेताओं  की महत्वकांक्षाओं के दुष्परिणामों  से देश गर्सित रहा है !

देश के अस्तित्व को सुदृढ़ के लिए राजनैतिक इछाशक्ति , प्रतिबद्धता   दूरदृष्टि  हमेशा ही महत्वकांक्षाओं की बलि चढ़ती रही !

किस पर्कार वर्ग विशेष जनकल्याण व् समान अवसरों  को खरिज कर केवल लाभ हथियाने  के लिए नीतियों  और योजनाओं से खिलवाड़ करता रहा !
विभिन  काल  खंडो मैं किस पर्कार आवश्यकताओं को सपनो का लिबास पहना कर  उल्लू सीधा करती रही ! 
आम  जन  ठग्गा रह गया !

मंगलवार, 20 मई 2014

N D A ka D N A



प्राकृतिक  आपदाओं  और निर्मित की  गयी आपदाओं  में हानि बराबर की  होती है !  २०१४  के चुनाव परिणाम से से शायद कांग्रेस के प्रतिभावान नेता और शीर्ष नेतृतव समझ पाये के अकाल कैसा होता है !
आमजन की अपेक्षाओं को नकारने की कीमत कई बरसों में चुकता होगी !

हालाँकि देश की कुल जनसँख्या के केवल १४ % समर्थन समर्थन  मात्र से ही भा ज पा  को २०१४ के चुनाव में विस्मयकारी जीत प्राप्त हुई है ! कई चैनलों से मिली खंबरों से लगता  है के आत्ममुगध  भावी प्रधानमंत्री  अब संयुक्त मोर्चे  संयोजक पद  भी  स्वयं के नियंत्रण मैं रखना चाहते है ! काया कोई  और   योग्य व्यक्ति पार्टी मैं नहीं जो ईस कर्तवय को निभा सके ?

या ये स्वयं केंद्रित सत्ता की लालसा का ही प्रतीक है ! कियूंकि जिसको विगत मैं अन्य राजनितिक दलों के व्यक्ति विशेष  के बारे मैं बड़े जोर शोर से  उजागर और प्रचारित किया गया था और इस मानदंड को नकारत्मक  बता कर  देश को नयी परिभाषा गढ़ने को परेरित किया गया था !

लोकतान्त्रिक दाल मैं व्यक्ति केंद्रित  सत्ता को स्थापित करने के सिद्धांत इतना ठोस हो चला है यह इस महवकांक्षा से स्पष्ट विदित है !

तथकथित  ज्ञान के ठेकेदार  अत्ति उत्साहित हो आर इसको भी तर्कसंगत बनाने मैं जुट गए हैं !

मंगलवार, 13 मई 2014

मिथक जब सैद्धांतिक रूप धारण करने लगते है  तब सविकारोकति के साहस  क्षीण  हो जात्ते हैं !

तब  भाव  व् तृप्ति के बीच की खाई अपना आकर ले  लेती है!

पर्ारम्भ मैं  बौद्धिकता इसे आभाव  मानती  परन्तु समय के साथ साथ यह निरन्तर विचलितता की प्रकिर्या को बढ़ा देत्ती है !
जीवन की सहजता बिखरने  लगती है!

अंतरंग उद्वेग ज्वालमुखी के रूप में कुंठाओं को उबलने लगते हैं ! संतुलन  असहज होकर डोलने लगता है तब मन क्षुब्ध्ता की ग्रिफ्त से निकल  पाता ! 
अनन्ता  मिथक हावी हो कर उद्वेग का दमन करते है   और फिरकभी न खत्म  होती टीस रगों  मैं बहने लगती है ! यह अवस्था जीवन को  अंधकार मैं धकेलने  जहां निश्ब्ध पशाताप अधूरी प्यास  को कुरेदने लगता है! और मन मेघों को तलाश मैं शुष्क होने लगता है ! 

जाने अनजाने  में ही समझौतों की परिणीति उजागर हो जीवन को भ्रम मैं डाल देती है और मिथक कभी शुद्ध तृष्णा को तृप्त  होने   नहीं देते ! तब अस्तित्व का हर अंग सवाल बन कर चुभने  लगता है ! मन तन  जीवन विपरीत दिशाओं मैं बढ़ाने लगता है ,हताशा मैं जीवन उप्पेर की और तकता है ! नीले शून्य में खुद को ढूंढने की चेष्टा  करता है ! निराशा भी अपने पाश मैं जकड  कर  लौटने को विवश कर देती है ! 

अन्तत आभाव ही शेष बचता है और उपलब्ध होता है! मिथक पूर्णता को  पराजित कर फिर स्थापित हो जात्ता है!
इस विड़म्बना को सहज कोमल  मन समझ नहीं पाता और क्षति के दर से पुरंता के अनुभव से भटक जात्ता है औचक ही नियंत्रित अनशन को सार्थक मानाने लगता है ! और ये चूक तृष्णा की तृप्ति के मार्ग अवरुद्ध कर देती है ! तब तुलनाओं में सुखद अनुभूति की तलाश तीव्र हो कर भंवर की और खींचती है  सपर्श व् तृप्ति की परिभाषाओं को वासनाओ की पूर्ति का आवरण पहना कर जीवन की सहजता को मिथक दूषिता के मार्ग पैर धकेल देता है , और जीवन  बोध  अनुभितियां केवल खोखली ही रह जत्ती है !