संविधान की मूल भावना के साथ क्या पूर्ण न्याय हो पेय या कोई भी विचारधारा इसे सार्थक कर पायी पिछले ६६ वर्षों में ?
प्रयास जारी हैं इसलिए एक अंतराल के बाद नागरिको ( मतदात्ताओं ) को अवसर दिया जाता है के उसको जो उनके जीवन के लिए नित्तियों को जहाँ सम्भव हो , आवश्यकता हो परिवर्तन कर प्रासंगिकता के सार को समझते हुए नित्तियों की उपयोगिता बढ़ाये !
प्रयास जारी है प्रासंगिकता व् उपयोगिता को समझने के ! या समझ लिए जाने के बाद ही उन तरीकों की खोज की जा रही है जिससे आश्वासनों पर भरोसा जगा कर सार्थकता को टाल दिया जाये ! राजनीती अज्ज के सन्दर्भ मैं इसी कुशलता का पर्याय बन कर उभर रही है ! अन्यथा एक निश्चित समय सीमा मैं उदेशयो की प्राप्ति न होने के कोई उचित व् तर्कसंगत सपष्ट कारण दिखाई नहीं पड़ते !
प्रयास जारी है क्य़ोंकि विफलताओं के सच को ढकने कि प्रतिसपर्धा है ! विफलताएं आश्वासनों से जनित वो भक्षी हैं जो उम्मीद के साथ साथ जीवन को भी लील रहा है !परन्तु पटकथा के सूत्रधार किसी भी स्तर पर स्वीकारने को तयार नहीं ! कहें कि सच को छुपाने की कुशलता पर गौरवान्वित महसूस करवाने मैं भी कोई कसार नहीं छोड़ते ! विचार धारा इसलिए पूर्ण प्रवाहित न हो कर कही ठहर गयी है या बाँझ बना दे गयी है ! कोई सार्थक उत्पत्ति नहीं ! प्रगति व् विकास के नाम पर जीन की दुभारता ही दिखाई पड़ती है !
प्रयास जारी है के अपेक्षाएं कहीं आंदोलन का फिर से न रूप ले लें ! इस लिए ठोस वायदों के घोषणापत्र जारी होते हैं ! योजनाओं और नीतियों को शायद इस लिए उजागर नहीं किया जाता ताकि सत्ता मैं कही चुक न हो जाये ! कियोंकि सच और प्रतिबधता को सफलताओं कि पहुँच से परे रखने मैं ही भलाई का गणित राजनीती के विद्यालय का मूल मंत्र है!
पर्यास जारी हैं क्योंकि धड़कने बाद रही हैं और जीत हासिल करने के लिए पूरी क्षमताओं को झोंका जा रहा है मतदत्तों को अपनी और लुभाने के लिए ताकि इछित परिणाम पा कर सत्ता पे काबिज हो सकें !
सत्ता आखिर क्यूँ ?? व्यक्तिगत महत्वकांक्षा कि पूर्ति का हठ ???
जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयोजन !!!
सार्वजानिक उत्थान के लिए योजनाओं के निर्माण की प्रतिबध्ता ?
या प्रगति कि परिभाषा को साकार करने के प्रयास मात्र !

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