मंगलवार, 13 मई 2014

मिथक जब सैद्धांतिक रूप धारण करने लगते है  तब सविकारोकति के साहस  क्षीण  हो जात्ते हैं !

तब  भाव  व् तृप्ति के बीच की खाई अपना आकर ले  लेती है!

पर्ारम्भ मैं  बौद्धिकता इसे आभाव  मानती  परन्तु समय के साथ साथ यह निरन्तर विचलितता की प्रकिर्या को बढ़ा देत्ती है !
जीवन की सहजता बिखरने  लगती है!

अंतरंग उद्वेग ज्वालमुखी के रूप में कुंठाओं को उबलने लगते हैं ! संतुलन  असहज होकर डोलने लगता है तब मन क्षुब्ध्ता की ग्रिफ्त से निकल  पाता ! 
अनन्ता  मिथक हावी हो कर उद्वेग का दमन करते है   और फिरकभी न खत्म  होती टीस रगों  मैं बहने लगती है ! यह अवस्था जीवन को  अंधकार मैं धकेलने  जहां निश्ब्ध पशाताप अधूरी प्यास  को कुरेदने लगता है! और मन मेघों को तलाश मैं शुष्क होने लगता है ! 

जाने अनजाने  में ही समझौतों की परिणीति उजागर हो जीवन को भ्रम मैं डाल देती है और मिथक कभी शुद्ध तृष्णा को तृप्त  होने   नहीं देते ! तब अस्तित्व का हर अंग सवाल बन कर चुभने  लगता है ! मन तन  जीवन विपरीत दिशाओं मैं बढ़ाने लगता है ,हताशा मैं जीवन उप्पेर की और तकता है ! नीले शून्य में खुद को ढूंढने की चेष्टा  करता है ! निराशा भी अपने पाश मैं जकड  कर  लौटने को विवश कर देती है ! 

अन्तत आभाव ही शेष बचता है और उपलब्ध होता है! मिथक पूर्णता को  पराजित कर फिर स्थापित हो जात्ता है!
इस विड़म्बना को सहज कोमल  मन समझ नहीं पाता और क्षति के दर से पुरंता के अनुभव से भटक जात्ता है औचक ही नियंत्रित अनशन को सार्थक मानाने लगता है ! और ये चूक तृष्णा की तृप्ति के मार्ग अवरुद्ध कर देती है ! तब तुलनाओं में सुखद अनुभूति की तलाश तीव्र हो कर भंवर की और खींचती है  सपर्श व् तृप्ति की परिभाषाओं को वासनाओ की पूर्ति का आवरण पहना कर जीवन की सहजता को मिथक दूषिता के मार्ग पैर धकेल देता है , और जीवन  बोध  अनुभितियां केवल खोखली ही रह जत्ती है !

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