आस्था का व्याकरण भी बड़ा विचित्र है। तर्क की इसमें कोई जगह नहीं, कोई भी मात्रा कहीं भी लग जाती हैं। अलग-अलग ढंग से व्याख्याएँ हैं। मंडी है और इस मंडी में घड़ियाल बड़े मजे से आम चूसते है । मूल से बिछड़े हुए सुख के धरातल को खोजते हैं। सहर्ष बहते भी है, बिना किसी ठोस पतवार के। व्यवहारिकता दूर किनारों पर रह जाती है। भरोसे के वस्त्र, पेड़ की शाखाओं के मित्र हो जाते हैं। भ्रम और यथार्थ के भंवर में असहाय जीवन छटपटाता है। यहाँ विण्डमनाएँ अठखेलियाँ करती है और आस का तिनका भी हाथों से फिसल जाता है, तब घड़ियाल की एन्ट्री होती है। इसका संग भाने लगता है, डर में कुछ भी अच्छा लगता है। गहराई का डर, पर कभी तली तक पाँव जमाने का साहस नहीं हो पाता, धारा ही इतनी तेज है, बहाव है, गति है।
करिश्मे का खेल भी होता है। क्योंकि कहीं ना कहीं विश्वास की सुक्ष्म भूमिका बनी रहती है आस-पास। लेकिन कितना शुद्घ, कितना सच्चा, कितना मूल। बाहरी या भीतरी, भाव या विचार, संस्कार या व्यवहार, स्थूल या सुक्ष्म, दया या धूर्तता। कहाँ फुरसत है ये सब जानने की, समक्षने की, स्वीकारने की। होड़ है मुक्त होने की, छुटकारा पाने की। आदमी अपने आप से छुपने लगता है, खुद को ठगने लगता है। यह दशा घड़ियाल अच्छे से समक्षता है, इसीलिए तो उसके दावे हैं पार लगाने के, मुक्ति देने के। अब उसका बाजार बड़ा लुभावना लगता है। जाने-अन्जाने में ही वक्त बदलने व किस्मत फिरने के सपने में समय चुक जाता है। ऋण अगली पीढियाँ चुकाती हैं। और घड़ियाल मजे से आम चुस्ता है। कलयुग है कह कर, अपनी इमानदारी का आश्वाशन दे पल्ला छाड़ लेते है। लाचार सा जीवन गुंगा हो जाता है, पाप की दलदल में से घड़ियाल बड़ी शान से बहार आता है, फिर वहीं आम चुस्ता है।
जिन्दगी के नाटक का सुत्रधार चार कन्धों पे हिचकोले खाता अपना सफर पुरा करता है। शेष रह जाती है, कुछ दर्द की राख और कर्ज की हड्डियाँ। मायूसी होसलों को घेर लेती है, नई रोशनी की दस्तक भी आँगन तक नहीं पहुँच पाती। फिर कोई टूटा हुआ दीप, एक नई आस दिखाता है और जिंदगी का पहिया अपनी धूरी पर धीरे-धीरे घूमने लगता है। लेकिन घड़ियाल फिर वहीं का वहीँ है। नई फसल के नए आम चुस्ता हैं।
एक छोटी सी आशा एक मजबूत इरादा
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मकरश्क्रांत के दिन नए जोशो उल्लाश में शुरू की गई मेरी ये कोशिश सभी
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17 वर्ष पहले

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