बहिष्कार ओर मौत,
दो ही तोहफे है फतवे के।
सजा और जुर्माना शोषण का एक ये भी नायाब तरीका है।
कुंठाओं के फन की छाया को भी अगर तार्किक चुनौती देने की हिम्मत की तो ईनाम फतवा।फतवे की परम्परा समाज में विकृत, शुद्र मानसिकता का एक गंभीर उदाहरण है। जहाँ समाधान की खोज समय की मांग है वहाँ कुंठित वर्ग के स्वयंभूओं के लिए फतवा एक ब्रह्माश्त्र है। जहाँ न्यायपूर्ण निर्णय समाज की सार्थक दिशा तय कर सकते है वहीं फतवा समाज को दहात में रख कर अपनी सत्ता को स्थापित करने का एक घृणित प्रयास है।
चौपाल की गरीमा पर एक बदनुमा दाग है फतवा। संस्कृति व मूल्यों की संरक्षक चौपाल को कटघरे में खड़ा करने की कुचेष्टाओं के पीछे के पहलूओं को समझना भी जरूरी हो जाता है।जागीर, बस यहाँ तक याद है, लेकिन जागीर की जिम्मेवारियों के तप से दूर का भी नाता नहीं। केवल व्यक्तिगत भूख मिटाने के लिए है फतवा। मांस का लोथड़ा नौचने को इक्ट्ठे, ताजे मांस पर जीब लपलपाती हैं, मांस नहीं मिला तो फतवा जारी। रात के अंधेरे में गिदड़े ने क्या कुछ नहीं किया। नियमों को क्या ताक पर नहीं धरा? फिर उजाले में भी उसकी मानसिक विकृति बहुत बार उजागर हुई है। कुछ नियम तो प्रासंगिक है, कुछ फतवे के लिए। मापदण्ड़ सभी के लिए बराबर हो इसका फतवे से कोई सम्बन्ध नहीं है। नियम टूटे नहीं, कुछ बदले, की फतवा जारी। और गिदड़ को तो मौका चाहिए। कैसे फिर उसका छत्रप बने, कैसे उसके महिमा मण्डल की आभा फिर लौटे, लोग उसकी वाह-वाही करे। चौपाल के सांझे हुक्के में बड़ा दम होता है, उसके कश लगाते ही ज्ञान में बड़ी वृद्घि होती है, सोच कर वह भी हुक्के की शरण में। करिश्मा हुआ, हुक्के ने राह दिखाई फतवा जारी। समाज को तोड़ने का अपराध? शादियों से समाज बनता है या टूटता है? इस सवाल को जवाब किसे के पास नहीं। लेकिन शादियाँ तो होती हैं, होनी भी है, कुछ नियमों के साथ तो कुछ बदलते परिवेश में। नियम टूटे नहीं कुछ बदले जरूर हैं और गीदड़ की ताक पूरी, समाज को तोड़ने का अपराध, की फतवे का समय आया।
लेकिन बेरोजगारी से हताश नई पीढी एक तरफ भू्रण हत्या का दंश झेल रही है और दूसरी तरफ फतवे का फन फूंकार रहा है। मान लिया जाए की समाज टकराव के दौराहे पर आन खड़ा हुआ है। सवाल टकराव का नहीं कुछ और है क्या समाधान चुक गये है? टूटती परम्पराओं को संस्कारों के लिए कौन जिम्मेदार है, कच्चे घड़े या उनको बनाने वाले। कहीं तो कोई चुक है। दोष किसी का भी हो, खामियाजा आज की पीढी को भी भुगतना पड़ता है। फतवे के जिन से नए होसले सहम से गए हैं। डर से भटकाव और भी बढता लग रहा है, समाज की बुनियाद को कौन सा घुन खोखला कर रहा है? नीचे से ऊपर की ओर, बहाव हो नहीं सकता, तो फिर ये क्या है?समाज का निमार्ण मानव समूह में परस्पर निर्भरता पर आधारित रहता है। सहयोग ही एकमात्र बन्धन है, लेकिन बिखराव आज के प्रयाय बन गए है। कैसे कहाँ किस का अभिशाप टूटते बन्धन का कारण है, सवार्थ या प्रतिस्पर्धा या तप और परिश्रम का शॉर्ट कट। प्यालों से गिरते आत्मबल या लालच की चौखट पर धाराशाई आत्म सम्मान। विश्लेषण जरूरी है लेकिन यथार्थ को स्वीकारने की हिम्मत ही कहाँ बची है इसलिए थोपने या कब्जा करने की परम्पराओं का बोल-बाला है और अपनी कमी को छुपाने के लिए फतवा जारी। दौहरे मापदण्ड है कभी जात के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी समाज के नाम पर मानवता का हनन जारी है। गिदड़ के अस्तित्व की लड़ाई है, लेकिन किससे?नई दिशा तय करना, नई पीढी का काम तो नहीं। तो क्या टैक्नोलोजिकल चैन्ज को स्वीकार कर लेना क्या आखरी विकल्प बचा है?
दो ही तोहफे है फतवे के।
सजा और जुर्माना शोषण का एक ये भी नायाब तरीका है।
कुंठाओं के फन की छाया को भी अगर तार्किक चुनौती देने की हिम्मत की तो ईनाम फतवा।फतवे की परम्परा समाज में विकृत, शुद्र मानसिकता का एक गंभीर उदाहरण है। जहाँ समाधान की खोज समय की मांग है वहाँ कुंठित वर्ग के स्वयंभूओं के लिए फतवा एक ब्रह्माश्त्र है। जहाँ न्यायपूर्ण निर्णय समाज की सार्थक दिशा तय कर सकते है वहीं फतवा समाज को दहात में रख कर अपनी सत्ता को स्थापित करने का एक घृणित प्रयास है।
चौपाल की गरीमा पर एक बदनुमा दाग है फतवा। संस्कृति व मूल्यों की संरक्षक चौपाल को कटघरे में खड़ा करने की कुचेष्टाओं के पीछे के पहलूओं को समझना भी जरूरी हो जाता है।जागीर, बस यहाँ तक याद है, लेकिन जागीर की जिम्मेवारियों के तप से दूर का भी नाता नहीं। केवल व्यक्तिगत भूख मिटाने के लिए है फतवा। मांस का लोथड़ा नौचने को इक्ट्ठे, ताजे मांस पर जीब लपलपाती हैं, मांस नहीं मिला तो फतवा जारी। रात के अंधेरे में गिदड़े ने क्या कुछ नहीं किया। नियमों को क्या ताक पर नहीं धरा? फिर उजाले में भी उसकी मानसिक विकृति बहुत बार उजागर हुई है। कुछ नियम तो प्रासंगिक है, कुछ फतवे के लिए। मापदण्ड़ सभी के लिए बराबर हो इसका फतवे से कोई सम्बन्ध नहीं है। नियम टूटे नहीं, कुछ बदले, की फतवा जारी। और गिदड़ को तो मौका चाहिए। कैसे फिर उसका छत्रप बने, कैसे उसके महिमा मण्डल की आभा फिर लौटे, लोग उसकी वाह-वाही करे। चौपाल के सांझे हुक्के में बड़ा दम होता है, उसके कश लगाते ही ज्ञान में बड़ी वृद्घि होती है, सोच कर वह भी हुक्के की शरण में। करिश्मा हुआ, हुक्के ने राह दिखाई फतवा जारी। समाज को तोड़ने का अपराध? शादियों से समाज बनता है या टूटता है? इस सवाल को जवाब किसे के पास नहीं। लेकिन शादियाँ तो होती हैं, होनी भी है, कुछ नियमों के साथ तो कुछ बदलते परिवेश में। नियम टूटे नहीं कुछ बदले जरूर हैं और गीदड़ की ताक पूरी, समाज को तोड़ने का अपराध, की फतवे का समय आया।
लेकिन बेरोजगारी से हताश नई पीढी एक तरफ भू्रण हत्या का दंश झेल रही है और दूसरी तरफ फतवे का फन फूंकार रहा है। मान लिया जाए की समाज टकराव के दौराहे पर आन खड़ा हुआ है। सवाल टकराव का नहीं कुछ और है क्या समाधान चुक गये है? टूटती परम्पराओं को संस्कारों के लिए कौन जिम्मेदार है, कच्चे घड़े या उनको बनाने वाले। कहीं तो कोई चुक है। दोष किसी का भी हो, खामियाजा आज की पीढी को भी भुगतना पड़ता है। फतवे के जिन से नए होसले सहम से गए हैं। डर से भटकाव और भी बढता लग रहा है, समाज की बुनियाद को कौन सा घुन खोखला कर रहा है? नीचे से ऊपर की ओर, बहाव हो नहीं सकता, तो फिर ये क्या है?समाज का निमार्ण मानव समूह में परस्पर निर्भरता पर आधारित रहता है। सहयोग ही एकमात्र बन्धन है, लेकिन बिखराव आज के प्रयाय बन गए है। कैसे कहाँ किस का अभिशाप टूटते बन्धन का कारण है, सवार्थ या प्रतिस्पर्धा या तप और परिश्रम का शॉर्ट कट। प्यालों से गिरते आत्मबल या लालच की चौखट पर धाराशाई आत्म सम्मान। विश्लेषण जरूरी है लेकिन यथार्थ को स्वीकारने की हिम्मत ही कहाँ बची है इसलिए थोपने या कब्जा करने की परम्पराओं का बोल-बाला है और अपनी कमी को छुपाने के लिए फतवा जारी। दौहरे मापदण्ड है कभी जात के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी समाज के नाम पर मानवता का हनन जारी है। गिदड़ के अस्तित्व की लड़ाई है, लेकिन किससे?नई दिशा तय करना, नई पीढी का काम तो नहीं। तो क्या टैक्नोलोजिकल चैन्ज को स्वीकार कर लेना क्या आखरी विकल्प बचा है?

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें