देश भी है , संविधान भी है , स्वन्तन्त्रता भी है , चुनाव भी है , मुद्दे भी है , और जनता जनार्दन भी -फिर पीडा क्यों ?
"मेरे देश की धरती गोला उगले , उगले दंगा फसाद "
कोयले की दलाली नही फिर भी सत्ता के मतवालों के चेहरे काले काले से क्यो है ? कुछ के तो और भी वीभत्स ।
शायद मानवता , दया, धर्म के सिद्धान्तो की आहुति देने के बाद यही रूप निखरता है ।
लेकिन अन्त्योदय का साक्षी यह नही समझाता । उद्धार की आस मे उसके बाल पीले ।
लेकिन कहाँ है सामाधान?
हमने देखा, हम देख रहे है , हम देखेगे की सम्मान जनक दो जून की रोटी कैसे?
मन्हगाई की जवानी थांठे मार रही है ।
कल्पनाये करने मे कहाँ पैसा लगता है । राम राज्य । अन्त्योदय का उद्धार। योजनाये है। नही होगी । तो मुद्दे नही । मुद्दे कभी मरा नही करते इस लिए फिर अगला चुनाव । फिर अपना चुनने का अवसर ।
प्रजातन्त्र मे अभी भी पूर्ण निष्ठा लगभग सारे देश की है लेकिन धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा के अँधेपन से ग्रसित मतदान को आवश्यक कानून बनाने की वकालत करने वाले कहाँ आमजन की पीडा को पहचान पायेगे।
पीडा ठगे जाने की । पीडा बेटी को व्याहने की । पीडा सम्मान जनक कमाने की। पीडा सिर छुपाने की । पीडा प्यास बुझाने की।
कही है रास्ता ? नही चुपके से गरीबी मुस्कुराई । कैसे समाधान मूर्खता पर बेरोजगारी का अट्ठाहस । जी इस पीडा के साथ । जगह जगह अस्पताल है गोली खा इलाज कर। समाधान के मानसून पर्यावरण के गरत मे गए।
मामला समाधान का नही भूँख का है बड़ो की भूँख भी बडी । समझ ले । और किस्म किस्म की है। परम्परा भी है की बडे की भूँख पहले । छोटा तो अपना है । त्याग करना उसका कर्तव्य है समझा लेगे। देख लेगे अगली बार। झन्डा देख कर जी लेगा।
अरे भूँखे पेट समाधान नही होत लाला। और सरकार का समाधान से कोइ सरोकार नही कडवा सच है जान ले स्वीकार ले ।
माँ की अस्मिता पर घात लगाने वालो का ही समाधान नही । उसकी सिस्कियाँ भी सुनाई नही देती । अब खुद सोच कुर्सी से बेवफाई का कलंक कौन अपने माथे पर लेना चाहेगा।
इसलिए अभाव का चर्खा कात । तसल्ली कर । दोष मढने की मानसिकता से उबर । अनुशासन मे रह । झन्डा देख वोट डाल , केवल वोट।
"मिले सुर मेरा तुम्हारा इंडिया शाइनिंग करे हमारा "
विकास जारी है इसलिए घबरा मत वोट डाल - जयहिंद ।
एक छोटी सी आशा एक मजबूत इरादा
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मकरश्क्रांत के दिन नए जोशो उल्लाश में शुरू की गई मेरी ये कोशिश सभी
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17 वर्ष पहले

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