चाय !
देश उबल रहा है ?
हर चाय वाले को कोई संकर्मण हो गया लगता है !
खामखा कि बड़ाई , बेस्वाद , जाने कब से पतीला नहीं धोया , पता नहीं कैसी पती , जाने कहाँ की , बस ज्ञान बताने लगे हैं !
अरे कौने से तक्षिला या पाटलिपुत्र के प्र्धायपक है , चाय बनानी ठीक से आयी नहीं , और चले चंगेज खान बनाने !
देश को चाय पे ही बैठाये रखोगे ? और विकास ?
गुबारे मत फुलाओ फट भी जाते है या उड़ जाते है हवा में अक्सर !
जब कोई स्वाद ही नहीं तो जबर्दस्ती की चुस्किया ,, झूठी सी नहीं लगाती ?
महंगाई का आलम , छूटे दो नहीं तौ बाकि के ३ नहीं मिलेंगे वापस !
संवेधानिक हो गया ?
लाचार से बस देखते रहो ! सिपाही कि तरह !
या फिर तलब मैं आप भी गोता लगाओ , गर्मी बढ़ रही है ! चुनाव भी करीब ही हैं !
कुछ समझे बाबू !
हाँ बाबू से से ज्यादा अपने को कुछ समझने का भ्रम मत पाल लेना।
अभी राजनीती के लिए तुम्हारी अकल कच्ची ही है. !
बाकि फिर भी स्वाद लेना है तौ खा लो लिज़ज़त पापड़ !
अब जहाँ भी जाओ इक टेकरी पे चाय वाला मिल ही जायेगा !
धयान से , कहीं लत लग गयी , हाँ कहीं कहीं चाय में कुछ ????
ये विकास कि गाथा चुनाव के समय ही क्यूँ गायी जाती हैं इसका जवाब
नहीं चंगेज खान के पास !

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