सोमवार, 28 मार्च 2016

फतेहबाद प्रकरण क्या उजागर करता है  ! 

बात यहाँ सम्मान या अपमान की नहीं परंतु क्षमता व् अक्षमता , कार्यशैली  में अतिवादिता एवं महत्वकांक्षा की ज्यादा है !
पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल को अगर प्रशाशन पर मजबूत पकड़ और अधिकारीयों को सख्त निर्देशों , व् समयबद्ध प्रगति के लिए याद किया जाता है तो आज के दौर में इस प्रकार की मजबूती को स्थापित करने के प्रयास असंगत कैसे मान  लिए जाये !
सत्ता  सरक्षण देने के लिए नहीं चुनी जाती वरन आम जन के सामूहिक हितो को समयबद्ध उपायों से रक्षित करने के लिए चुनते है !यही लोकतंत्र का मूल भावना और कार्यशैली भी है !
उसमे किसी मत्वकांक्षा विशेष की गुंजाइश नहीं होती ! लेकिन साथ ही गरिमापूर्ण व्यवहार व् जवाबदेही की भी प्रतिबद्धता निश्चित है ! यह घटना एक घटना मात्र नहीं बल्कि मनोदशा का भी साक्ष्य है ! एक क्षेत्र में प्रयासों से उब्लब्धि हासिल करने का अर्थ यह नहीं की अप्प सर्वेसर्वा है और आप की वयक्तिगत महत्वकांक्षा संविधान द्वारा निहित कार्यक्षेत्र में गरिमापूर्ण शालीनता से उच्च हो सकती है !
संविधान  द्वारा जो अधिकार निश्चित किये गए है उनका उदेश्य जनहित के लिए कार्य करना है न की  अपनी  पूर्वाग्रहित दृष्टिकोण से प्रेरित  मत्वकांक्षा की पूर्ति !
सामन्य नागरिको समूह  जो अपनी बेदना  या समस्या को जब शीर्ष के सामने ले जाता है तो वो उन परिस्थियों से जूझने के बाद जब हल न मिले तब आगे बढ़ता है न की   प्रायोजित होता है !
 अपने क्षत्र में होने वाली  असमाजिक कामो और उनसे होने  वाले बुरे प्रभावों को दूर करना या करवाने का   सामूहिक प्रयास हर समाज में किया जाता है ! उस पर  नियंत्रण  और अंकुश लगाने  का प्रावधान बनाये गए कानून के तहत ही  नियुकत अधिकारी को प्रदत  किये जाते हैं ! अधिकारी जनसेवक के रूप में काम करने के लिए नियुक होते है जिसके लिए उनको उचित सुविधाये व् संसाधन  भी मिलते हैं ! अक्सर ऐसा देखा गया है के कुछ अधिकारी आम नागरिको से स्वयं को बहुत श्रेष्ठ मानकर उनके प्रति पूर्वाग्रहित हो कर ही दोयम दर्जे  से व्यव्हार करते हैं !जबकि उनको अधिकार नागरिको की संशयों , समस्यां के समाधान करने के लिए मिलती है  जिनका वो स्वामित्व स्वयं के लिए  मान लेते है !  सरकारी अधिकारीयों में  समाधान करने की क्षमता , जवाबदेही की अनिवर्यता  को अनदेखा कर अपनी सुविधाओं को जुटाने की प्रविर्ती अधिक देखने में आती  है जिसके प्रति अक्सर जम  समूहों में रोष पाया जाता है ! जबकि अधिकारीयों में एक व्यापक  संवेदनशील दृष्टिकोण  को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है जिससे कार्यों को करने में   अधिक सहजता हो !
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नागरिको , प्रतिनिधियों और अधिकारीयों में एक विशेष संतुलन की आवश्यकता भी अनिवार्यता भी ! जब  भी इस प्रकार का द्वन्द सामने प्रकट  होता  उसका निराशाजनक प्रभाव ही   समाज को उद्वेलित  करता है ! किसी भी लोकतान्त्रिक वयवस्था में नागरिको की सकिर्य भागीदारी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता , और अधिकारीयों की भूमिका व् जवाबदेही  कार्यो में सहायक के रूप में तय होती है ! नागरिक ही  अपनी प्राथमिकताएं तय करते है जिनके लिए उन्होंने जनप्रितिनिधियों को उन नीतियों के किर्यान्वन के लिए के लिए चुना है ! प्रजातंत्र की सफलता में अह्कारियों से महत्वपूर्ण  योगदान की अपेक्षा की जाती जो एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है ! वहीं  दूसरी और जनता दवरा चुन कर आये प्रितिनिधियों से , सरकार में  विशेष पद पर स्थापित मंत्रियों  से भी  बहुत सयम और सहनशीलता की अपेक्षा होती है ! वो  अधिकारीयों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत होते है , प्रताड़ना का नहीं ! किसी भी राजनैतिक दल  के वैचारिक मूल्यों  से प्रेरित हो कर संतुलन संभव नहीं ! राजनेता के आचरण में व्यपक्ता का आधार अनिवार्य है !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें