सवाल विकास का या पिछड़ेपन का नहीं , सवाल राजनितिक उदेश्य का है !
राष्ट्र किस रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहता है सवाल उस उदेश्य का है !केवल सतही सवालों के समाधान खोजना राजनीती की परिभाषा मात्र नहीं है !सवाल व्यपक्ता की पृष्ठभूमि में कही गहरे में है जिन्हें एक महत्वकांक्षा विशेष के अंतर्गत अनदेखा किया जा रहा है !
भारतीय स्वाधीनता संग्राम से स्वतंत्रता प्राप्ति , संविधान की स्थापना के प्रयास केवल सत्ता स्थापित करने के सिद्धांत को परिणित करने के लिए नहीं किये गए थे !अपितु राष्ट्र की व्यापकता , अखंडता , सहिष्णुता को मूल में रख कर स्वयंनिर्भरता व् प्रगति के लिए किये गए थे ! जो आज के दौर में सत्ता के लिए बढ़ती महत्वकांक्षा के साथ लुप्त पराए हो चुकी है !
गतिरोध की राजनीती सहयोग के सिद्धांत को धत्ता घोषित करने पे तुली है !विभिन राजनैतिक विचारधाराओं ने जिस प्रकार एक राष्ट्र की परिकल्पना को प्रस्तुत किया है व ही गतिरोध का मूल मुख्य कारन यही जिसके चलते सियासत ताकत का प्रतीक बन कर रह गयी है !
देश के विभिन प्रदेशों में स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिंक दल भी प्रगति में समग्र योगदान में विफल ही रहे हैं !निर्धारित समय में शक्ति प्रदर्शन इतर कोई उपलब्धि उनके खाते में है नहीं ! जन कल्याण की नीतियों पे अधिनायकवाद ,निजी स्वामित्व , महिमा मंडन की परम्परा हावी होती चली गयी ! धर्म को राजनितिक लाभ के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा !
आरोप प्रत्यारोप ही आज की राजनीती की परिभाषा बन चुके है ऐसे में में जो आशंका का वातावरण बना है उसमे प्रगति व् कल्याण की उम्मीद करना कहाँ तक सार्थक है !
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें