सोमवार, 28 मार्च 2016

सवाल विकास का या पिछड़ेपन का नहीं , सवाल राजनितिक उदेश्य का है !
राष्ट्र किस रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहता है सवाल उस उदेश्य का है !

केवल सतही सवालों के समाधान खोजना राजनीती की परिभाषा  मात्र  नहीं है !सवाल व्यपक्ता की पृष्ठभूमि में कही गहरे में है  जिन्हें एक महत्वकांक्षा विशेष के अंतर्गत अनदेखा किया जा रहा है !
 सवाल व्यापक राष्ट्रीयता का है , व्यापक जन  कल्याण का है जिस दबाने के लिए  पूंजीवाद ने राजनैतिक विचारधारा की आँखों पे बड़ी चतुराई से पट्टी बांध  दी है  और जिसको उतरने में अब  स्वयं राजनीती को भी डर  लगाने लगा है !
भारतीय  स्वाधीनता संग्राम से स्वतंत्रता प्राप्ति  , संविधान की स्थापना के प्रयास केवल सत्ता स्थापित करने के सिद्धांत को परिणित करने के लिए नहीं किये गए थे !अपितु राष्ट्र की व्यापकता , अखंडता , सहिष्णुता को मूल में रख कर स्वयंनिर्भरता  व् प्रगति के लिए किये गए थे ! जो आज के दौर में सत्ता के लिए बढ़ती महत्वकांक्षा के साथ लुप्त पराए हो चुकी है !
गतिरोध की राजनीती सहयोग के सिद्धांत को धत्ता घोषित करने पे तुली है !विभिन राजनैतिक विचारधाराओं ने जिस प्रकार एक राष्ट्र की परिकल्पना को प्रस्तुत किया है व ही गतिरोध का मूल  मुख्य कारन यही जिसके चलते सियासत ताकत का प्रतीक बन कर रह गयी है !
पूंजीवाद हमेशा आंकड़ों की बाज़ीगरी को प्रोत्साहित करता रहा है और यही उसकी ताकत भी है ! अगर इन आंकड़ों से बहार निकल कर देखा जाये तो देश की स्थिति आज भी संतोषजनक स्तर से कही कोसो दूर ही है ! जन कल्याण की विभिन योजनाओ को नौकरशाही ने अपनी लोलुप मनोवृति से किस तरह  ठिकाने लगाया इसका उदाहरण हर 5 वर्षीय  योजनाओ की विफलताओं से साफ  है !
विभिन  राजनितिक  विचारधाराओं , परिभाषाओं  व् महत्वकांक्षाओं ने निरन्तर  व् समग्र विकास को बार बार बाधित किया है ! ये त्रासदी हर दौर  और दशक में  राजनितिक उदेश्यों  को लीलती रही है ! देश का उपेक्षित वर्ग दो जून की रोटी की जदोजहद से उभर नहीं पाया ! स्वयंनिर्भर प्रगति का संग्राम  सियासत के खेल में बदल कर यह गया !
राष्ट्रिय शक्ति व् चेतना को जिस उदेश्य के लिए स्वतंत्रता संग्राम से जागृत किया किया गया था वह जिस प्रकार  से पथभ्रष्ट हुयी है इसका बोध आज भी किसी को चिंतित नहीं करता ! व्यापकता और सहमति को खंडित करने के प्रयोग से समाज  की दिशा दिन ब  दिन भ्रमित हो रही है ! एक नए प्रकार की घृणा व् डर अपना वर्चस्व बना रहा है ! परिवर्तन  के बहाव  को भौतिकतावाद ने अपने लाभ के लिए किस और मोड़ दिया  के , पारिवारिक , समाजिक , नैतिक , राजनितिक  मूल्यों का अवघटन तीव्रता से जारी है !
    देश के विभिन प्रदेशों में स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिंक दल भी प्रगति में समग्र योगदान में विफल ही रहे हैं !निर्धारित समय में शक्ति प्रदर्शन  इतर कोई उपलब्धि उनके खाते में है नहीं ! जन कल्याण की नीतियों पे अधिनायकवाद ,निजी स्वामित्व , महिमा मंडन की परम्परा हावी होती चली गयी ! धर्म को राजनितिक लाभ के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा !
आरोप प्रत्यारोप ही आज की राजनीती की परिभाषा बन चुके है ऐसे में  में जो आशंका का वातावरण  बना है उसमे प्रगति व् कल्याण की उम्मीद करना कहाँ तक सार्थक है !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें