सोमवार, 28 मार्च 2016

कष्ट की स्थिति या उसके भय से मुकति के प्रयास  में जो भी स्त्रोत सार्थक प्रतीत होता है वही आस्था का प्रतीक  उभरता है !
 क्षीण आत्मबल वही  संपर्पण कर विश्वास के भर्म  की नयी चादर ओढ़ लेता है ! यही परम से नेता टूटता है और भर्म  के मायावी महल का आकर्षण  हावी होने लगता है , यहाँ भर्म भेद को निगल जाता है !
यही पर  वास्तविकता के उजालों से  विपरीत अंधकार की यात्रा आरम्भ होती है ! भर्म का अहसास हमेशा सुखद लगता है और यही विवेक पर  भी विराम लगता है ! ज्ञान के दीप  में  तर्क की बाती  बुझने लगती है !
एक नए कारोबार की शुरुआत होती है जहाँ मुनाफा  ही उदेशय होता है , कीमत का कोई औचित्य नहीं !

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