कष्ट की स्थिति या उसके भय से मुकति के प्रयास में जो भी स्त्रोत सार्थक प्रतीत होता है वही आस्था का प्रतीक उभरता है !
क्षीण आत्मबल वही संपर्पण कर विश्वास के भर्म की नयी चादर ओढ़ लेता है ! यही परम से नेता टूटता है और भर्म के मायावी महल का आकर्षण हावी होने लगता है , यहाँ भर्म भेद को निगल जाता है !
यही पर वास्तविकता के उजालों से विपरीत अंधकार की यात्रा आरम्भ होती है ! भर्म का अहसास हमेशा सुखद लगता है और यही विवेक पर भी विराम लगता है ! ज्ञान के दीप में तर्क की बाती बुझने लगती है !
एक नए कारोबार की शुरुआत होती है जहाँ मुनाफा ही उदेशय होता है , कीमत का कोई औचित्य नहीं !

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